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May 16, 2022 · 3 min read

*स्मृति डॉ. उर्मिलेश*

*स्मृति डॉ. उर्मिलेश*
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डॉ. उर्मिलेश (6 जुलाई 1951 – 16 मई 2005 ) से मेरा संपर्क *1983* में मेरे विवाह के साथ आरंभ हुआ । विवाह के अवसर पर आपने एक सुंदर गीत कन्या पक्ष की ओर से लिख कर भेजा था ,जो चार पृष्ठ की विवाह-पत्रिका में प्रकाशित हुआ । यह शीशे के फ्रेम में जड़ा हुआ हमारे पास उनकी एक मधुर यादगार के रूप में सदैव सुरक्षित रहा । गीत का मुखड़ा इस प्रकार है :
*जीवन पथ पर आज चले हैं दो राही संसार के*
*1986* में मेरी पुस्तक *रामपुर के रत्न* प्रकाशित हुई तो उसकी भूमिका में डॉक्टर उर्मिलेश का प्रोत्साहन से भरा हुआ एक पत्र भी प्रकाशित हुआ ।
*1988* में गीता के 18 अध्यायों के संबंध में मेरे गद्यात्मक विचारों पर आधारित पुस्तक *गीता विचार* की जो विस्तृत समीक्षा उन्होंने की और सहकारी युग हिंदी साप्ताहिक में प्रकाशित हुई ,उससे एक कुशल समीक्षक के रूप में उनकी रचनाधर्मिता की बहुआयामी प्रतिभा प्रकट होती है । उनके स्नेह और आशीष के लिए भला कोई शब्द हो सकते हैं !
कहानी संग्रह *रवि की कहानियाँ* का लोकार्पण उनके ही हाथों हुआ था । इस अवसर पर रामपुर पधार कर उन्होंने अपनी कविताओं से एक तरह से *डॉक्टर उर्मिलेश नाइट* का ही वातावरण बना दिया था । एक के बाद एक कविताएँ उनके श्रीमुख से संपूर्ण ओजस्विता के साथ आभासित होती गईं और श्रोताओं का अपार समूह टैगोर शिशु निकेतन ,रामपुर के विशाल प्रांगण में उन कविताओं का आनंद उठाता रहा। पुस्तक के संबंध में कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं । उन्होंने सुनाया था :

*वैसे तो बहुत खास हैं रवि की कहानियाँ*
*लेकिन हमारे पास हैं रवि की कहानियाँ*
*ऊपर से पढ़ोगे तो कहानी ही लगेंगी*
*अंदर से उपन्यास हैं रवि की कहानियाँ*
गजल के 5 – 6 शेर और भी थे। कुल मिलाकर पुस्तक के लोकार्पण पर जो कुछ कहा जाना चाहिए था ,उससे बढ़-चढ़कर डॉक्टर उर्मिलेश जी का आशीष मुझे मिला । समारोह में एक खास बात यह भी रही कि मंच छोटा था और उस पर जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और जिला न्यायाधीश के विराजमान होने के बाद डॉक्टर उर्मिलेश के लिए सुविधाजनक रीति से बैठ पाना कठिन हो रहा था । उन्होंने कार्यक्रम को अपना कार्यक्रम समझा और खुद को “एडजस्ट” करते हुए मंचासीन अतिथियों को पूरा सम्मान दिया ।
उसके बाद हमने पुनः रवि की कहानियाँ के शायद तीसरे भाग के लोकार्पण के लिए डॉक्टर उर्मिलेश जी को आमंत्रित किया । उन्होंने सहमति दे दी लेकिन फिर बाद में डायरी देखने पर उन्हें पता चला कि इस तारीख के आसपास अनेक कार्यक्रमों की श्रंखला पहले से ही बुक है । तब उन्होंने मुझे एक विस्तृत पत्र लिखा तथा कार्यक्रम में न आ सकने के लिए खेद प्रकट करते हुए जो भाव व्यक्त किए ,वह उनकी आत्मीयता तथा भीतर से उनमें विद्यमान सादगी और निश्छलता को उजागर करते थे । उसी पत्र में उन्होंने डॉ. मोहदत्त साथी का नाम कार्यक्रम के लिए सुझाया और फिर बाद में डॉ. मोहदत्त साथी आए भी।
कारगिल विजय के उपलक्ष्य में जब मैंने *सैनिक* काव्य संग्रह लिखने के बाद उसकी एक प्रति उन्हें भेजी तो उनका अत्यंत प्रोत्साहन से भरा हुआ पत्र प्राप्त हुआ । प्रशंसा करने में उन्होंने कभी कंजूसी नहीं बरती ।
एक बार उन्होंने हिंदी के अनेक कवियों का एक संग्रह प्रकाशित किया था । उसमें मेरी कविता को भी स्थान मिला था ।
सहकारी युग (साप्ताहिक) में प्रकाशित मेरी रचनाओं पर दसियों बार उनकी प्रोत्साहन से भरी हुई प्रतिक्रियाएँ प्रकाशित हुई हैं ।
उनका व्यक्तित्व परिवार के एक बड़े भाई के समान बन गया था । उस समय जबकि उन्हें आकाश की अनंत ऊँचाइयों को छूना था ,वह असमय ही अनंत में विलीन हो गए । उनके न रहने की पीड़ा के लिए शब्द नहीं हैं ।
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लेखक : रवि प्रकाश, बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451

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