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Nov 29, 2021 · 6 min read

सेहरा गीत परंपरा

*वैवाहिक सेहरा – गीतों की परंपरा : एक अध्ययन*
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विवाह के अवसर पर सेहरा लिखने और सुनाने की बहुत पुरानी परंपरा है । *2 अप्रैल 1852 ईसवी* को बादशाह *बहादुर शाह जफर* के पुत्र *जबाँ बख्त* की जब शादी हुई ,तब भारत के दो सुविख्यात शायरों ने इस अवसर पर अपना- अपना सेहरा लिखकर प्रस्तुत किया था । एक सेहरा मशहूर शायर *मिर्जा गालिब* ने लिखा था और दूसरा उस समय के प्रतिभा के धनी शायर *इब्राहीम जौक* ने लिखा था । मिर्जा गालिब ने सेहरे का पहला शेर इस प्रकार लिखा था :-
*खुश हो ऐ बख्त कि है आज तेरे सर सेहरा*
*बाँध शहजादा जबाँ बख्त के सर पर सेहरा*
अंतिम शेर में उन्होंने एक प्रकार से अपने प्रतिद्वंदी शायर को चुनौती दे डाली थी ,यह लिखकर :-
*हम सुखनफहम हैं गालिब के तरफदार नहीं*
*देखें इस सेहरे से कह दे कोई बढ़कर सेहरा*
इब्राहिम जौक ने जो सेहरा पढ़ा, उसकी अंतिम पंक्तियों में मिर्जा गालिब को उनके कथन का उत्तर मिल गया । इब्राहिम जौक की सेहरा – ग़ज़ल का अंतिम शेर इस प्रकार बना:-
*जिसको दावा हो सुखन का ये सुना दो उनको*
*देख इसे कहते हैं सुखनवर सेहरा*
सेहरा लिखना और सुनाना गजल के रूप में भले ही 1852 में बहादुर शाह जफर के जमाने से ही चला आ रहा है लेकिन कालांतर में यह गजल तक सीमित नहीं रहा।
*6 मार्च 1961* को एक सेहरा *रेशमी रुमाल* पर लिखकर छपवाया गया था। मेरी बुआ जी *सुधा रानी* (रामपुर ,यू.पी.)का विवाह सहारनपुर निवासी आदरणीय श्री *प्रमोद कुमार* जी के साथ हुआ । उस समय एक गीत के रूप में सेहरा *महेंद्र ,सहारनपुर* नाम से कविवर ने भेंट किया था । इस सेहरा गीत की प्रारंभिक पंक्ति इस प्रकार हैं :-
*प्रीति – पर्व के बंधन ऐसे प्यारे लगते हैं*
*जैसे नील गगन के चाँद सितारे लगते हैं*
मेरे विवाह पर *13 जुलाई 1983* को हिंदी काव्य मंचों के अत्यंत लोकप्रिय गीतकार बदायूँ निवासी *डॉउर्मिलेश* ने एक बहुत प्रवाहमयी सेहरा – गीत लिखा था तथा उसे चिकने मोटे कागज पर छपवा कर विवाह के समय वितरित भी किया गया था। सेहरा गीत की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:-
*मन के भोजपत्र पर लिखकर ढाई अक्षर प्यार के*
*जीवन – पथ पर आज चले हैं दो राही संसार के*
उसके उपरांत 5 छंदों में इस गीत का विस्तार है । प्रत्येक छंद में 6 पंक्तियाँ हैं तथा छठी पंक्ति “जीवन पथ पर आज चले हैं दो राही संसार के” इस पंक्ति को दोहराती है । गीत का प्रवाह देखते ही बनता है । मेरे विवाह पर डॉक्टर उर्मिलेश द्वारा लिखित सेहरा – गीत कन्या – पक्ष की ओर से *दुल्हन मंजुल रानी* के पिता प्रसिद्ध पत्रकार तथा सहकारी युग हिंदी साप्ताहिक के संपादक *श्री महेंद्र प्रसाद गुप्त* द्वारा प्रस्तुत किया गया था ।
एक सेहरा – कविता गोरखपुर निवासी प्रसिद्ध कवि श्री माधव मधुकर की भी प्रकाशित हुई थी । कविता इस प्रकार है :-
*यह पनपती जिंदगी भरपूर हो*
*यह सँवरती जिंदगी मशहूर हो*
*साध्य ही “रवि प्रकाश” के माथे का तिलक हो*
*सिद्धि ही “मंजुल” की माँग का सिंदूर हो*
*जहाँ भी यह रहें इनकी सदा सरसब्ज बगिया हो*
*महकता भाल का चंदन ,दमकती भाल बिंदिया हो*
*इन्हें भगवान सुख औ’ शांति का सच्चा असर दे दे*
*मैं कवि हूँ मेरी कविता की इन्हें सारी उमर दे दे*
*माधव मधुकर ,18 चंद्रलोक लॉज ,गोरखपुर*
वर पक्ष की ओर से पिताजी *श्री राम प्रकाश सर्राफ* ने *डॉक्टर चंद्र प्रकाश सक्सेना कुमुद* द्वारा लिखित सेहरा – गीत छपवा कर बँटवाया था । डॉक्टर चंद्र प्रकाश सक्सेना कुमुद पिताजी के सुंदर लाल इंटर कॉलेज में हिंदी के प्रवक्ता थे । बाद में विद्यालय के प्रधानाचार्य पद को भी आपने सुशोभित किया । कवि सम्मेलनों में तो आपका जाना नहीं होता था लेकिन साहित्य- साधना की दृष्टि से आपका काफी ऊँचा स्थान है । सेहरा- गीत के कुछ अंश इस प्रकार हैं:-
*मन से मन का मिलन अमर हो*
*मलय बयार बहे जीवन में*
वास्तव में सेहरा – गीत लिखना अपने आप में एक बड़ा साहित्यिक कार्य होता था। जो कवि जिस स्तर का होता था , उसके सामने उसी स्तर का सेहरा – गीत लिखने की चुनौती रहती थी ।आखिर कोई भी कवि जो रचना प्रस्तुत कर रहा है ,वह उसके स्वयं के उच्च मापदंडों पर खरी उतरनी आवश्यक होती है ।
जब धीरे-धीरे सेहरा – गीत की परंपरा राजपरिवार से आरंभ हो गई ,तब वह सर्वसाधारण के वैवाहिक उत्सवों में भी प्रयोग में आने लगी। बहादुर शाह जफर के पुत्र की शादी में भले ही गजल के रूप में सेहरा प्रस्तुत हुआ हो ,लेकिन बाद में शादियों में यह गीत के रूप में ज्यादा प्रयोग में आया । गजल एक सीमित दायरे में सिमटी रही और गीत चारों तरफ खुशबू के रूप में बिखर गया।अधिकांश सेहरा गीत जो आजादी के बाद के 50 वर्षों में लिखे गए और विवाह का एक अभिन्न अंग बने, वह *अधिकांशतः गीत* थे । इन गीतों में मधुरता थी तथा *हिंदी के शब्दों का बहुतायत से प्रयोग* किया गया था । *सेहरा-गीतों में एक खास बात यह भी हुई कि वर पक्ष तथा कन्या पक्ष के माता-पिता ,दादा-दादी अथवा कुछ मामलों में दिवंगत बुजुर्गों के नाम भी सेहरा गीत में रखा जाना एक रस्म – सी बन गई ।* गीतकारों के सामने यह एक बड़ी चुनौती होती थी कि वह किस प्रकार से गीत की पंक्तियों में कुछ “खास नामों को”” इस प्रकार से फिट करें कि वह नाम आ भी जाएँ तथा गीत की लयात्मकता पर भी कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े । कुछ गिने चुने काव्य क्षमताओं के धनी कवि ही इस चुनौती से निबटते थे अन्यथा अनेक बार सेहरा गीतों में नाम के चक्कर में लय टूट जाती थी ,क्यों कि मात्रा – भार का निर्वहन नहीं हो पाता था।
अनेक कवियों के ऊपर जब बहुत बड़ी संख्या में सेहरा – गीत लिखने का दबाव पड़ा, तब उन्होंने एक सेहरा गीत लिखकर उसी को बार-बार थोड़ा – बहुत तोड़ – मरोड़ करके कई -कई विवाह उस एक सेहरा गीत से ही निपटा दिए । इसमें उन्हें केवल दूल्हा-दुल्हन आदि के नामों में ही परिवर्तन करना पड़ता था । बहुत से सेहरा – गीत आज अनेक परिवारों में इसी रूप में देखे जा सकते हैं । उन्हें देख कर पहली नजर में यह पता करना कठिन है कि यह पहली बार का लिखा हुआ सेहरा- गीत है अथवा दूसरी या तीसरी बार की पुनरावृत्ति है ।
*आजादी के बाद 50 वर्षों तक विवाह में सेहरा – गीतों की तूती बोलती रही । बिना इसके कोई शादी संपन्न नहीं होती थी।* विवाह से पहले जहाँ अन्य बहुत -सी तैयारियाँ करनी होती थी ,उनमें से एक तैयारी स्थानीय कवि से संपर्क करके एक बढ़िया – सा सेहरा – गीत लिखवाने की भी हुआ करती थी। आमतौर पर कविवर सहर्ष इस दायित्व को निभाने के लिए उपलब्ध हो जाते थे । अतिथिगण विवाह में जितनी रूचि भोजन करने में रखते थे ,उतना ही उनका काव्य – प्रेम सेहरा – गीत को सुनने में भी रहता था ।कवियों को सम्मान देना तथा उनके गीत को आदरपूर्वक सुनना उस समय की एक प्रथा थी । बाद में धीरे-धीरे सेहरा – गीत को सुनने के प्रति लोगों का आकर्षण समाप्त होता गया ।
पुराने जमाने में बारात में जाने वाले लोग भी बहुत सभ्यता के साथ तथा गरिमापूर्वक बारातों में चलते थे । उनके भीतर अहंकार का पुट जरूर होता था लेकिन उनमें फिर भी एक प्रकार का अनुशासन देखा जा सकता था । जयमाल समय पर होती थी तथा भोजन भी रात्रि में उसी समय होता था जो भोजन करने का समय होना चाहिए। लोग बारात के द्वार पर पहुंचने के तत्काल बाद अपनी – अपनी कुर्सियों पर व्यवस्थित रूप से बैठ जाते थे तथा कार्यक्रम को शांति पूर्वक देखते और सुनते थे ।
बीसवीं सदी खत्म होते होते परिस्थितियाँ बदल गई । बारातें ही जब रात को 12:00 बजे जयमाल – स्थल पर पहुंचेंगी तथा उसके बाद भी बारातियों का नाचना बंद नहीं होगा, जब किसी को खाने की ही फिक्र नहीं होगी तब गीत सुनने का माहौल कैसे बन पाएगा ? जिस प्रकार की उच्छृंखलता बरातों में देखने में आने लगी ,उसके कारण किसी भी कवि को सेहरा – गीत पढ़ने के लिए उचित वातावरण मिलना असंभव हो गया। क्या तो वह सेहरा पढ़े और किसको सुनाए ? सब तो नागिन डांस में तल्लीन हैं। हार कर आयोजकों ने सेहरा लिखवाना और पढ़वाना ही बंद कर दिया । इस तरह कवियों की विवाह में जयमाल के अवसर पर जो डेढ़ सौ साल से उपस्थिति शानदार तरीके से दर्ज होती रही थी ,वह समाप्त हो गई तथा फिर यह परंपरा 21वीं सदी की शुरुआत से लगभग विलुप्त हो गई । अब शायद ही कोई शादी ऐसी होती होगी ,जिसमें सेहरा – गीत लिखा और पढ़ा जाता होगा।
एक सेहरा गीत मैंने भी अपने मित्र श्री बृज बिहारी (दिल्ली निवासी) के सुपुत्र के विवाह पर भेजा था । संभवतः वह प्रकाशित नहीं हुआ था।
★★★★★★★★★★★★★★★★
*लेखक : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*

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