Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
Sep 17, 2017 · 1 min read

जाग रे मुसाफिर – मुक्तक

???
“जाग मुसाफिर हुआ सवेरा,
हो गयी भोर हर अंधेरा,
यहाँ न कोई टिका है कभी
ये दुनिया इक रैन बसेरा।
???

क्या तेरा और क्या है मेरा।
इक दिन छोड़ देना है डेरा,
उस मालिक को भज ले ओ मूर्ख ,
जो है सच्चा संरक्षक तेरा।”

– – रंजना माथुर दिनांक 20/06/2017
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
©

261 Views
You may also like:
हिन्दी साहित्य का फेसबुकिया काल
मनोज कर्ण
इंसानियत का एहसास भी
Dr fauzia Naseem shad
रावण - विभीषण संवाद (मेरी कल्पना)
Anamika Singh
अब भी श्रम करती है वृद्धा / (नवगीत)
ईश्वर दयाल गोस्वामी
✍️लक्ष्य ✍️
Vaishnavi Gupta
तू तो नहीं
सुरेन्द्र शर्मा 'शिव'
जीवन एक कारखाना है /
ईश्वर दयाल गोस्वामी
असफ़लताओं के गाँव में, कोशिशों का कारवां सफ़ल होता है।
Manisha Manjari
ख़्वाब सारे तो
Dr fauzia Naseem shad
जादूगर......
Vaishnavi Gupta
तुम ना आए....
डॉ.सीमा अग्रवाल
बहुमत
मनोज कर्ण
पिता
Buddha Prakash
अब आ भी जाओ पापाजी
संदीप सागर (चिराग)
अपने दिल को ही
Dr fauzia Naseem shad
छीन लिए है जब हक़ सारे तुमने
Ram Krishan Rastogi
मेरी तकदीर मेँ
Dr fauzia Naseem shad
"निर्झर"
Ajit Kumar "Karn"
विन मानवीय मूल्यों के जीवन का क्या अर्थ है
सुरेश कुमार चतुर्वेदी
जब भी तन्हाईयों में
Dr fauzia Naseem shad
✍️दो पल का सुकून ✍️
Vaishnavi Gupta
पापा करते हो प्यार इतना ।
Buddha Prakash
मेरे पिता
Ram Krishan Rastogi
क्यों हो गए हम बड़े
सुरेन्द्र शर्मा 'शिव'
सही गलत का
Dr fauzia Naseem shad
बुध्द गीत
Buddha Prakash
मेरे बुद्ध महान !
मनोज कर्ण
कोशिशें हों कि भूख मिट जाए ।
Dr fauzia Naseem shad
मोर के मुकुट वारो
शेख़ जाफ़र खान
भोजपुरी के संवैधानिक दर्जा बदे सरकार से अपील
आकाश महेशपुरी
Loading...