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सुधा सिंधु से तर निकाली हो जैसे

*गीतिका*
सुधा सिंधु से तर निकाली हो जैसे।
शरद चाँदनी तुम दिवाली हो जैसे।

हृदय पुष्प आश्रय सतत पाये जाता।
तुम्हीं वह उराधार डाली हो जैसे।

भरे भाव भीतर भले भव के भारी।
बिना आपके चित्त खाली हो जैसे।

मुरझता विखरता रहा जीवन उपवन।
सदा सींचते प्रेम – माली हो जैसे।

सकल संपदा सौंप दे ईश्वर लेकिन।
तुम्हें पा जगत राशि टाली हो जैसे।

टिके क्यों न दृग देख मंजुल वो आभा।
पगा प्रेम में मूर्ति ढाली हो जैसे।

सुवासित सुभासित मधुरता ये ‘इषुप्रिय’।
प्रकृति ने युगों तक सम्हाली हो जैसे।

अंकित शर्मा ‘इषुप्रिय’
रामपुर कलाँ,सबलगढ(म.प्र.)

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