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सास-बहू के झगड़े और मनोविज्ञान

भारतीय समाज में सास-बहू का झगड़ा कोई दुर्लभ घटना नही बल्कि अति सामान्य है और इसके पीछे का मुख्य कारण भारतीय समाज का अति पितृसत्तावादी होना है क्योकि सास और बहु का जो झगड़ा है वह आजादी और अधिकारों का झगड़ा है। और लड़कियां बचपन से ही आजादी और अधिकारों से वंचित रहती है। इसलिए जो लकड़ीयां अपने पिता के यहाँ पूर्ण आजादी और अधिकारों के साथ पली-बढ़ी होती है वह ना तो बहु बनकर दुखी होती और ना ही सास बनकर

वास्तव में बहु, सास को अपनी आजादी में बहुत बड़ा रोड़ा मानती है, वहीं सास बहु को अपने अधिकार को छीनने बाली घुसपैठिया। जबकि लड़की की माँ भी अपनी बेटी से वही सब काम करबाती है और व्यवहार सिखाती है जो सास उससे ससुराल में करबाती है और जिस व्यवहार की उम्मीद करती है, किंतु अपनी माँ के यहाँ लड़की सब कुछ हँसते हुए और जिम्मेदारी के साथ करती है जबकि अपनी ससुराल में उसे यह सब करना गुलामी जैसा महसूस होता है क्योकि अपनी माँ के घर और वहाँ के हर सदस्य से लड़की भावनात्मक रूप से जुड़ी होती है किंतु ससुराल में वह केबल अपने पति को ही अपना मानती है और उसी से भावनात्मक रूप से जुड़ी रहती है और बाकी के सभी सदस्यों को अपने ऊपर बोझ समझती है इसलिए हमेशा उनसे दूर रहने की सोचती है। और बिल्कुल यही मनोविज्ञान माँ का अपनी बेटी के लिए होता है अर्थात माँ अपनी बेटी को अपने अधिकारों में घुसपैठिया नही मानती और वह अपनी बेटी के गुस्सा को भी हँसकर टाल देती है जबकि बहु के लिए इतना लचीलापन सास में नही होता

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