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Jun 4, 2021 · 1 min read

सावन में

सावन की रिमझिम से गीली चुनरिया
चिपकी है जैसेकि चिपकें सवरिया ।
बरसो भले ही, पर कड़को न बदरा
अकेली हूँ घर में, मैं उनकी दुलरिया ।

सावन में तन मन को भाये उछलना
अंगड़ाई जब ली, सधी ना अंगरिया ।
बिजली ने छू लिया, अनसधा यौवन
जा मिली बादल में. खा कर गुलटिया ।

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