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12 Jun 2016 · 1 min read

सादी है नून रोटी सांचे हैं मिटटी के

ग़ज़लों में सांस लेते अरमान ज़िन्दगी के
सादी है नून रोटी सांचे हैं मिटटी के

मिट्टी के फर्श पर है उम्मीद की दीवारें
ज़ख़्मी ये बदली है घुस छत में झोपड़ी के

एक बूँद चाह भर कर उतरी कि हैं दरारें
इस ईंट के ढेरों पर छप्पर हैं दिहाड़ी के

चाहत पे अटकते है तेरी झलक देख कर
हर रोज़ की दौलत हैं ये शेर बेबसी के

मुराद कर रहे हैं कुछ साल मुफलिसी में
उम्मीद हमसे रखते सवाल ज़िन्दगी के

मेरा बेनाम चेहरा औ लाख सरज़मी पे
हर रोज़ सजदा करते माटी पे इस ज़मी के

~ सूफी बेनाम

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