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साँझ ढल रही है

फिर साँझ ढल रही है , बयार चल रही है,
तिरोहित होते सूर्य का, पहाड़ी आलिंगन कर रही है
नभ नील वर्ण त्यागकर , श्याम में घुल जाएंगे
चन्द्र के आगमन पर , सितारे जगमगाएंगे ।
थककर पखेरू शाम को घोंसलों में लौट आयेंगे
लिपटकर बच्चे माँ से, खुशी खुशी चहचहाऐंगे
सुगंध मन्द केतकी से वसुन्धरा महक रही है
फिर साँझ ढल रही है – – – – – –

माँ सुबह शाम बारहमास , रसोई में तप रही है
स्वेद-आर्द्र देह , दग्ध हस्त, हर पीड़ा वो सह रही है
हर शाम की तरह पिता जी, फिर से देर में आऐंगे
आशाओं से भरी गठरी वो, खूँटी पे टाँग जाएंगे
चूल्हे में माँ और धूप में पिता, हर रोज तप रहे हैं
सन्तान के भविष्य की, माला वो रोज जप रहे हैं
संघर्ष की यही कथा, हर चौखट कह रही है
फिर साँझ ढल रही है – – – – – –

बैठकर एकांत तट में , मैं स्वयं को ढूँढता
पल रहे विचार मन में, मौन से मैं सींचता
भीगे पग लहर में ज्यों ही, मन में भी लहर चले
रोक ले विकार को तू , बढ़ न जाय विष कहीं
चरण शरण गृहण करूँ , या केवल हाथ जोड़ लूँ
या करूँ शंखनाद शम्भू, भवबन्धनो को तोड़ दूँ
सहज सरल प्रवाह समक्ष गङ्गा जी बह रही है
फिर साँझ ढल रही है – – – – – –

फिर नई भोर होगी, नयी उमंग होगी
इस चराचर जगत में, नयी तरंग होगी
चेहरों पे फिर खुशी के , भाव बिखर जायेंगे
वृक्षों पर लता और बगिया में फूल खिल जाएंगे
हर जीव कीट प्राणीमात्र नित इसी चक्र में घूम रहा
प्रकृति के इस नाद में हर कोई झूम रहा
सुख दुख की ये कहानी, हर दिन बदल रही है
फिर साँझ ढल रही है – – – – – –

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