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सम्भव कैसे मेल सखी…?

पेड़ों का आलिंगन करती,
लिपट रही है बेल सखी
बाट निहारूँ प्रियवर की मैं,
सम्भव कैसे मेल सखी।

धरणी ने श्रृंगार धरा है,
पादप की हरियाली से,
रश्मि प्रभाकर मानो जैसे,
स्वर्णाभूषण बाली से,

राह करघनी सी लगती है,
कैसा है यह खेल सखी,
बाट निहारूँ प्रियवर की मैं,
सम्भव कैसे मेल सखी।

मन व्याकुल है बाँहें आतुर,
एक दीर्घ आलिंगन को,
कर्ण पिपासु हैं मेरे बस,
प्यार भरे सम्बोधन को,

बिन अनुराग चलेगी कैसे,
जीवन की यह रेल सखी,
बाट निहारूँ प्रियवर की मैं,
सम्भव कैसे मेल सखी।

इन सूनी राहों पर तन्हा
कब तक मुझको चलना है,
प्रेम अगन की इन लपटों में,
आखिर कब तक जलना है,

प्रेममयी सागर में मुझको,
तू ही आज धकेल सखी।
बाट निहारूँ प्रियवर की मैं,
सम्भव कैसे मेल सखी।

पंकज शर्मा “परिंदा”🕊️

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