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17 Jun 2022 · 1 min read

समसामयिक बुंदेली ग़ज़ल /

पंचों , सरपंचों , नेतों की ।
चरचा होन लगी बोटों की ।

मौ बा रय हैं छैल-छबीले,
आशा जगन लगी नोटों की ।

रँगे-लड़ैया मुलक भरे के,
नुक्की टैन लगे मूछों की ।

जात-पाँत की मेड़ डार कें,
बोनी होन लगी खेतों की ।

अच्छे-अच्छे इज्जत बारे,
मुजरन लगे बात छोटों की ।

भैया पुज रय,विन्ना पुज रईं,
भौजी माँग भरें नोटों की ।

पंडत जी ने कान फूँक दय,
माला फिरन लगी चेलों की ।

पंचों , सरपंचों , नेतों की ।
चरचा होन लगी वोटों की ।।
००००
—– ईश्वर दयाल गोस्वामी ।

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