Oct 18, 2016 · 1 min read

समय बदलते सूखी धरती मुस्काती:: जितेंद्रकमलआनंद ( पोस्ट ५१)

मुक्तक

समय बदलते सूखी धरती मुस्काती जैसे बाला ।
नयी नवेली ओढ़ चुनरिया मदमाती जैसे बाला ।
सृष्टि — चक्र का घूर्णन निश्चित सुखद समय भी लाता यों
नवल प्रकृति की गोद — मोद में शर्माती जैसे बाली ।।५१!!
——- जितेन्द्र कमल आनंद

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