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सतुआन

सतुआन पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार तथा नेपाल के तराई क्षेत्र में सतुआन का बेहद महत्व है. यह लोक संस्कृति का एक चर्चित पर्व है, जो धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है. यह नवीन फसल का भी पर्व है. सतुआन में खेतों से नये कटे अन्न जैसे- चना, जौ आदि, आम का टिकोरा, प्याज, हरी मिर्च का प्रयोग होता है. चने का सतुआ अकेले भी प्रयोग होता है और जौ आदि के सतुआ के साथ मिश्रित भी करके. सात अनाजों का सतुआ- सतंजा भी प्रचलित है. टिकोरे की चटनी बनती है, जिसके साथ सतुआ खाया जाता है. प्याज कतरकर थाली में सजाया जाता है. स्वाद के लिए साधारण नमक के स्थान पर काले नमक का प्रयोग होता है. इसे सानकर भी खाया जाता है और घोलकर पेय के रूप में भी प्रयुक्त होता है. घड़े के ठन्डे पानी का प्रयोग होने से सतुआ का सोंधापन और भी बढ़ जाता है. न तेल का प्रयोग न चूल्हे पर चढ़ाने का झंझट. इसकी यही विशेषता आज से कुछ दशक पूर्व इसे गठरी में बांधकर लम्बी यात्रा पर ले जाने का कारण रहा है. ठेंठ देहातों में यह अभी भी जीवित है. जो सतुआ खाए होंगे या सतुआ की लस्सी पिए होंगे वह इसे कैसे भूल पाएंगे. मौका लगे तो सतुआ खा लें या इसके लस्सी का आनंद ले लें.
यह कई नामों यथा- जुड़ शीतल, टटका बासी, सतुआ संक्रांति, बिसुआ आदि से भी जाना जाता है. सतुआन अत्यधिक प्रचलित है. सतुआन वैशाख संक्रांति को प्रतिवर्ष आता है, तब सूर्य मीन से मेष राशि में प्रवेश करते हैं. सतुआन को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं. वैदिक काल में अपाला नाम की एक विदुषी महिला का उल्लेख मिलता है, जो सफ़ेद दाग जैसी किसी बीमारी से ग्रस्त थी. अपाला इस बीमारी से मुक्ति के लिए इंद्र की तपस्या की. कहते हैं अपाला ने सत्तू का भोग लगाया और ईख का रस चढ़ाया, जो सामान्य हिन्दू पूजा में किया जाता है. इंद्र यह भोग पाकर प्रसन्न हुए और अपाला को रोग मुक्त कर दिया. आज भी रोगी को ठीक होने के बाद जब अनाज देने की शुरुआत की जाती है तो प्राय: पतली खिचड़ी के बाद ठोस सत्तू के सेवन का विकल्प दिया जाता है. सत्तू अत्यंत पौष्टिक होता है और सुपाच्य भी.
सतुआन आपके स्वस्थ जीवन का एक सांस्कृतिक संकेत है. इसे लुप्त होने से बचाया जाना चाहिए.

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