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संकोच – कहानी

संकोच – कहानी

मिश्रा जी के परिवार में “पलक” ही एकमात्र संतान है | घर संपन्न है और संस्कारित भी | घर में एक ही संतान होने की वजह से पलक को एक अच्छे साथी का अभाव हमेशा ही महसूस होता है | वह अपनी भीतर की टीस , अपनी समस्याएँ किसी से साझा नहीं कर पाती है | और स्वयं को कुछ भ्रांतियों में कैद कर लेती है जैसे सकुचाना, किसी से कुछ न कहना, किसी पर विश्वास न करना , खुलकर बात न करना आदि – आदि | उसका ये स्वभाव स्कूल और घर में उसे हीन भावना का शिकार बना देता है | कई बार उसे झिड़कियां भी मिलती हैं | बार – बार उसे यही कहा जाता है कि इतनी बड़ी हो गयी पर अक्ल धेले भर की नहीं है | कल को ब्याह होगा तो लोग क्या कहेंगे कि माँ – बाप ने कुछ सिखाकर नहीं भेजा |
पलक अब ग्यारहवीं कक्षा की छात्रा है | अब उसे किशोर शिक्षा कार्यक्रम का भी हिस्सा बनना है | पर पलक को इस बारे में कुछ भी पता नहीं है | स्कूल में किशोर शिक्षा कार्यक्रम हेतु सभा आयोजित की जाती है | बच्चों को चार समूह में बांटा जाता है | पलक भी कल्पना चावला समूह की सदस्य घोषित की जाती है | प्रथम सभा के दौरान किशोर शिक्षा क्यों आवश्यक है और क्या है किशोर शिक्षा , इस विषय पर चर्चा आयोजित की जाती है | अलग – अलग समूह के बच्चे अपने विचार साझा करते हैं | पर जब पलक की बारी आती है तो वह शर्म से सिर झुकाकर खड़ी हो जाती है और कुछ भी नहीं कहती | कार्यक्रम की प्रभारी शिक्षिका पलक के इस व्यवहार को समझने का प्रयास करती है | और सुनिश्चित करती है कि वह पलक की इस झिझक को मिटाकर उसके जीवन को एक दिशा देने का प्रयास करेंगी |
सामान्य दिनों की तरह एक दिन किशोर शिक्षा कार्यक्रम की प्रभारी चावला मैडम एक बच्चे को भेजकर पलक को अपनी जीव विज्ञान प्रयोगशाला में बुलाती हैं | पलक सकुचाई और सहमी – सहमी सी मैडम के पास पहुँचती है | मैडम पलक को अपने पास बैठाकर उससे बात करती हैं और बात – बात में ही उसके भीतर की टीस को जानने का प्रयास करती हैं | वे पलक को समझाती हैं कि स्त्री और पुरुष समाज के दो पहिये हैं | इनकी आपसी समझ से ही स्वस्थ समाज का निर्माण होता है | हमें अपने शरीर के बारे में पूर्ण जानकारी होनी चाहिए | साथ ही पुरुषों का व्यवहार और उनके बारे में , उनकी सोच से परिचय होना अति आवश्यक है | जीवन में आगे बढ़ने के लिए स्वयं को आगे लाना आवश्यक है | जीवन में जो भी मौके मिलें उन्हें अवसर समझ उनका पूर्ण लाभ उठाना चाहिए | ताकि हम अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो सकें | यूं संकीर्ण मानसिकता या संकोची स्वभाव से पीड़ित हो स्वयं को दिशा से नहीं भटकाना चाहिए |
चावला मैडम के चार – पांच प्रयासों के बाद पलक की जिन्दगी में सकारात्मक परिवर्तन आरम्भ हो जाते हैं | वह खुलकर बात करने लगती है | अपने घर में भी अपनी समस्या से अपनी माँ को अवगत कराने लगती है | धीरे – धीरे उसके भीतर की संकोची प्रवृत्ति का अंत हो जाता है | इसका यह परिणाम होता है कि पलक की बहुत सी समस्याएँ स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं | पलक उच्च शिक्षा प्राप्त करती है | और अपने आत्मविश्वास के दम पर स्वयं को समाज में स्थापित करती है | वह चावला मैडम की तरह हे एक आदर्श शिक्षिका बनना चाहती है | पलक आज एक स्कूल में मनोविज्ञान विभाग में लेक्चरर है और बच्चों का मार्गदर्शन कर रही है |
अपने जीवन में हुए इन परिवर्तनों का पूर्ण श्रेय वह अपनी शिक्षिका चावला मैडम को देती है | वह अपनी माँ को चावला मैडम के योगदान के बारे में बताती है | पलक की माँ अपनी बेटी पलक के साथ चावला मैडम का धन्यवाद करने और पलक को आगे भी उनका आशीर्वाद मिलता रहे इसके लिए उनके स्कूल जाती हैं | और उनका धन्यवाद ज्ञापन करतीं हैं और पलक के शिक्षिका बनने के गौरवपूर्ण पल में उन्हें हिस्सेदार बनाती हैं | चावला मैडम खुश हैं कि वे पलक के जीवन को दिशा देने में सफल हो सकीं | वे पलक को ढेर सारा आशीर्वाद एवं शुभकामनाएं देती हैं |
पलक और उसकी माँ घर की ओर चल देते हैं |

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