श्री हनुमत् कथा भाग-5

श्री हनुमत् कथा , भाग – 5
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अपनी बालसुलभ क्रीड़ाओं से माता – पिता को दीर्घकालिक सुख एवं आनन्द प्रदान करते हुए हनुमानजी 5 वर्ष के हो गये । यही समय हनुमानजी की शिक्षा का सबसे उपयुक्त समय था । अपने बच्चों को उपयुक्त समय पर समुचित शिक्षा का प्रबंध करना प्रत्येक माता – पिता का सर्वप्रमुख कर्तव्य होता है । इसी बात को ध्यान में रखकर माता अंजना ने हनुमानजी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया तो हनुमानजी छलाँग मारकर सूर्यदेव के पास पहुँच गये और उन्हें प्रणाम करके विद्या प्रदान करने का विनम्र अनुरोध करने लगे । अपनी गति चलायमान होने के कारण विद्या प्रदान करने में असमर्थता जाहिर करने पर हनुमानजी द्वारा विना कोई व्यवधान पड़े वार्तालाप के समान ही सम्पूर्ण विद्या प्रदान करने लगे । अति अल्प समय में ही हनुमानजी ने समस्त वेद – वेदांग , शास्त्र , कला आदि की शिक्षा प्राप्त , करली और स्वयं द्वारा सूर्य पुत्र सुग्रीव के रक्षित होने की गुरु दक्षिणा देकर शीघ्र ही माता – पिता के पास लौट आये । हनुमानजी का जन्म श्री राम की सेवा के लिए हुआ है यह विचार करके भगवान शिव मदारी के रूप में हनुमानजी को साथ लेकर बन्दर का खेल दिखाने के बहाने श्री राम के महल के पास पहुँचकर बालकों को विचित्र बन्दर का खेल दिखाने लगे जिसे देखकर श्री राम के मित्र भूल गये । इससे व्याकुल श्री राम ने लक्ष्मण जी को भेजा । लक्ष्मण जी ने लौटकर बताया कि महल के पास एक विचित्र बन्दर आया है जो अति सुन्दर संस्कृत में अति विचित्र वाणी बोले रहा है ।यह सुनकर श्री राम भी उसे देखने पहुँचे उससे प्रसन्न होकर अपने साथ महल में ले आये । वगीचे में , नदी पूर , नगर में , प्रत्येक स्थान पर हनुमानजी हर समय श्री राम के साथ रहते और उनका मनोरंजन करते । इस प्रकार श्री राम के साथ रहते हुए हनुमानजी का कुछ समय बीत गया । यज्ञ रक्षार्थ श्री राम जब विश्वामित्र मुनि के साथ जाने लगे तो श्री राम का संकेत पाकर हनुमानजी अन्तर्ध्यान हो गये ।
प्रस्तुतकर्ता :- डाँ तेज स्वरूप भारद्वाज
।। बोलो वटुक बाल बजरंगबली की जय ।।

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