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Nov 7, 2021 · 6 min read

श्री अग्रसेन भागवत ः पुस्तक समीक्षा

*#पुस्तकसमीक्षाश्रीअग्रसेनभागवत
पुस्तक समीक्षा*
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*श्री अग्रसेन भागवत :* *लेखक आचार्य विष्णु दास शास्त्री*
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प्रकाशक : श्री अग्र महालक्ष्मी मंदिर 33/ 6/1 /ए.बी. बड़ा पार्क ,बल्केश्वर चौराहा,
आगरा 282005 (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 94106 68734 तथा 82794 66054
तृतीय संस्करण: दिसंबर 2020
मूल्य ₹351
2000 प्रतियाँ
कुल पृष्ठ संख्या 376
“●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●
*समीक्षक : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
_मोबाइल 99976 15451_
●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●
आचार्य विष्णु दास शास्त्री जी द्वारा लिखित श्री अग्रसेन भागवत पढ़कर मन प्रसन्न हो गया । महाराजा अग्रसेन के संबंध में इससे अच्छा अभी तक नहीं लिखा गया है । सुंदर काव्य के माध्यम से महाराजा अग्रसेन की यशगाथा शास्त्री जी ने प्रस्तुत की है तथा यह जनभाषा में लिखित है । इसमे मात्र खड़ी बोली के स्थान पर लोकबोलियों की प्रधानता है। काव्य में माधुर्य है ,जनप्रियता है और सब को आकर्षित करने का सहज गुण विद्यमान है । यह कथा वास्तव में सबको आनंद प्रदान करने वाली है तथा संसार के सर्वश्रेष्ठ महापुरुष के जीवन और कार्यों से परिचित कराने वाली है । कवि ने पुस्तक को पूरे मनोयोग से लिखा है तथा एक महाकाव्य को लिखने में जो परिश्रम ,समय और ध्यान देना पड़ता है ,उन सब की पुष्टि यह पुस्तक कर रही है । महाराजा अग्रसेन के जीवन- चरित्र पर एक विस्तृत संगीतमय पुस्तक की कमी लंबे समय से महसूस की जा रही थी। आचार्य जी की यह पुस्तक उस कमी को निस्संदेह पूरा कर रही है । पुस्तक की काव्य कला की विशेषता यह है कि अगर किसी सर्वसाधारण समूह के बीच में इसका पाठ किया जाता है ,तब जहाँ एक ओर विद्वानजन इसे सुनकर आनंदित होंगे, वहीं अनपढ़ से अनपढ़ व्यक्ति भी इसको समझ सकेगा और महाराजा अग्रसेन के जीवन- आदर्शों को अंगीकृत कर सकेगा।
. एक उदाहरण देखिए :-
*गोत्र अपन को छोड़कर ,अन में कीजे ब्याह*
*अग्रेश्वर आदेश यह , रक्तशुद्धि अनचाह*

*शंका इसमें कोई ना ,रखो मान विश्वास*
*अग्रवंश रीती यही , कहते विष्णूदास*
*( पृष्ठ 267 )*
पुस्तक की एक विशेषता यह भी है कि जो काव्य आचार्य श्री ने लिखा है, उसका खड़ी बोली में गद्य – भावार्थ भी उन्होंने लिखा है । इस तरह अर्थ को समझने में अगर कोई शंका है ,तो वह भी समाप्त हो जाती है । उदाहरण के तौर पर इन्हीं काव्य-शब्दों का अर्थ इस प्रकार लिखा गया है :-
*”* जैमिनी ऋषि कहते हैं हे जन्मेजय एक अपने गोत्र को छोड़कर अन्य 17 गोत्रों में आप ब्याह करें। भगवान अग्रसेन जी का यह आदेश भी है और न चाहते हुए भी रक्त शुद्धि का प्रमुख सूत्र भी । विष्णु दास जी कहते हैं कि इस पद्धति में शंका करने वाली कोई बात नहीं है । बस आप इसका मान रखें । इसमें विश्वास रखें । विवाह की यह पद्धति ही 5100 वर्ष से अधिक समय से महान अग्रवंश की स्थिरता की रही है और यही शाश्वत सिद्धांत है तथा एकमेव सूत्र भी *।।”*
पुस्तक में महाराजा अग्रसेन के जीवन – चरित्र को 47 अध्यायों में विभाजित किया गया है । इन अध्यायों में महाराजा अग्रसेन के जन्म से लेकर मृत्यु तक का संपूर्ण विवरण विस्तार से दिया गया है। विशेषता यह भी है कि इसमें महाराजा अग्रसेन की पत्नी महारानी माधवी तथा उनके राज्य सिंहासन के उत्तराधिकारी ज्येष्ठ पुत्र महाराज विभु के जीवन से संबंधित विभिन्न जानकारियाँ भी विस्तार से प्रस्तुत की गई हैं। स्थान – स्थान पर पुस्तक में नीतिगत दोहे प्रस्तुत करके लेखक ने पुस्तक का मूल्य अनेक गुना बढ़ा दिया है ।
पुस्तक का प्रस्तुतीकरण भागवत कथा के रूप में किया गया है तथा इसमें महाराज परीक्षित के पुत्र राजा जनमेजय को जैमिनी ऋषि द्वारा महाराजा अग्रसेन की जीवन गाथा सुना कर भवसागर से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता हुआ दिखाया गया है । इस तरह पुस्तक के “भागवत” नाम को सार्थकता प्रदान की गई है ।पुस्तक में महाराजा अग्रसेन को *भगवान कृष्ण का समकालीन* बताते हुए उन्हें *”भगवान शंकर का अवतार”* दर्शाया गया है ।
देखिए श्री अग्रसेन भागवत :-

*श्री हरि विष्णू भू पधराए ,पीछे-पीछे श्री हर धाए*
*श्री हरि कृष्ण द्वारिकाधीशा ,पुरी आगरे हर ली शीशा*

” *आपको यह तो ज्ञात होगा ही कि श्री हरि विष्णु भूलोक में पधार चुके हैं ।उनके* *पीछे-पीछे भोलेनाथ जी पृथ्वी पर जा चुके हैं। श्री हरि कृष्ण रुप में अर्थात* *द्वारिकाधीश के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जबकि श्री हर ने अग्रसेन जी के रूप में* *आग्रेयपुरी को अपने शीश पर धारण कर लिया है ।”*
(प्रष्ठ 22)
यह स्पष्ट रूप से धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर के अवतार की अवधारणा को महाराजा अग्रसेन जी के जीवन चरित्र में प्रकाशित करते हुए उन्हें *भगवान अग्रसेन* के रूप में लोकमानस में प्रतिष्ठित करने का कवि का प्रयत्न है । समाज में विश्व के अग्रणी महापुरुषों को लोक में अत्यधिक आदर के साथ देखते हुए यही परिपाटी रही है ।
महाभारत के युद्ध में महाराजा अग्रसेन द्वारा भाग लिए जाने की व्यग्रता को कवि ने इन पंक्तियों के द्वारा प्रकट किया है, जिसमें महाराजा अग्रसेन कहते हैं कि मैं युद्ध को जाना चाहता हूँ तथा उनके पिता महाराज वल्लभ असमंजस में हैं:-

*मैं भी इस युध में जाऊँगा ,अनुमति दें अति सुख पाऊँगा*
*वल्लभ बोले वय है छोटी ,फिरहू बात करत हो मोटी*
*साढ़े पंद्रह के बस तुम हो ,रण में जाने को उत्सुक हो ?*
*(पृष्ठ 56)*
पुस्तक में महाराजा अग्रसेन के प्रतापी साम्राज्य को 3000 वर्ष तक सुचारू रूप से चलना बताया गया है तथा उसके पश्चात यह स्थान उजड़ गया तथा अब विगत 2000 वर्षों से यह अपनी समृद्धि और सौंदर्य खो चुका है। इसी बात को कवि ने इन शब्दों में वर्णित किया है :-

*त्रय सहस्त्र वर्षन चला ,विधिवत अग्रेराज*
*विक्रमि प्रारँभ तक रहा ,भू यश अग्र समाज*
*(पृष्ठ 323)*
पुस्तक जनसमूह के सम्मुख भागवत कथा के रूप में संगीतमय प्रस्तुति की दृष्टि से अत्यंत उचित है। कवि ने संभवत इसी को ध्यान में रखकर पुस्तक की रचना भी की है। आचार्य विष्णु दास शास्त्री ने ही सर्वप्रथम *अग्रसेन भागवत की कथा कहने का प्रचलन* आरंभ किया था तथा अनेक स्थानों पर आपने अग्र भागवत सफलतापूर्वक कही है। आप महाराजा अग्रसेन इंटर कॉलेज, आगरा के पूर्व अध्यापक हैं । अंग्रेजी तथा हिंदी में एम.ए. तथा बी.एड. हैं । कवि के रूप में आपने अनेक प्रकार की चालीसा ,आरती आदि लिखी हैं ,तथा उन्हें जनता के सामने सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया है । आशा है कि इस पुस्तक को *तुलसीकृत रामचरितमानस की भाँति समाज में सम्मान मिलेगा* और महाराजा अग्रसेन का जीवन- चरित्र यह भागवत कथा के रूप में जन – जन तक पहुँचा सकेगी।
जहाँ तक पुस्तक की प्रमाणिकता का सवाल है, लेखक ने अग्र वैश्य वंशानुकीर्तनम् ,उरु चरितम ,महालक्ष्मी व्रत कथा तथा अग्रवंश का इतिहास पुस्तकों का उल्लेख “श्री अग्रसेन भागवत” में किया है :-

*द्वापर युग अंतिम बेला थी ,कलियुग आरँभ भई घड़ी थी*
*अग्रवंशवैश्यानुकीर्तनम् ,सच लागत यह सँग उरुचरितम्*
” उस समय द्वापर युग की अंतिम बेला थी अर्थात संक्रमण काल था । कलियुग का आरंभ हो रहा था । अग्रवालों के अन्य ग्रंथ *अग्रवैश्यवंशानुकीर्तनम्* तथा *उरु चरितम्* से भी यही सत्य प्रकट होता है।”
(प्रष्ठ43)

*महालक्ष्मी व्रत कथा , अग्रवंश इतिहास*
*विष्णु दास सब ने कहा ,यही तिथी है खास*

*”कुछ अन्य ग्रंथों महालक्ष्मी व्रत कथा और अग्र वंश इतिहास के अनुसार भी यही* *तिथि खास मानी गई है ,ऐसा विष्णु दास जी का मानना है ।”*
प्रष्ठ 44 )
फिर भी यह प्रश्न तो उठता ही है कि ग्रंथ में इतनी विस्तृत जो जीवन – कथा सामग्री दी गई है ,उसका मूल आधार क्या है? कवि का कहना है :-
“यह ग्रंथ कैसे लिखा गया ? किसने लिखा ? मैं नहीं जानता । मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आगरा स्थित श्री अग्र महालक्ष्मी मंदिर जो मेरा मन -मंदिर है जहाँ मुख्य आसन पर हमारी कुलदेवी माता महालक्ष्मी विराजमान हैं उन्होंने ही मुझसे यह ग्रंथ लिखवाया है । ” (प्रष्ठ 11 )
वास्तव में ऐसा होता भी है । संसार के सभी महान कार्य अलौकिक तथा दिव्य घटना के रूप में घटित हो जाते हैं । श्री अग्रसेन भागवत भी उन्हीं में से एक है ।
पुस्तक में कुछ अंश बढ़ाए जा सकते थे । डॉ सत्यकेतु विद्यालंकार द्वारा दिए गए शोध के अनुसार 18 गोत्रों के माध्यम से अग्रोहा के जन – समाज में जो क्रांति महाराजा अग्रसेन ने की थी , उसका लाभ उठाते हुए उचित सामग्री बढ़ाकर दी जा सकती थी । 18 गोत्रों की रचना के मूल मंतव्य को जो वस्तुतः सामाजिकतावाद की दिशा में अभूतपूर्व कदम था, इससे स्पष्ट समझाया जा सकता था । पशु बलि के प्रसंग को भी थोड़ा और विस्तार देना अच्छा रहता । उरु-चरितम् में इसका विस्तृत वर्णन है।
अग्रवालों के इतिहास के संबंध में *1870* में *भारतेंदु हरिश्चंद्र* ने *महालक्ष्मी व्रत कथा* अर्थात *अग्रवैश्य वंशानुकीर्तनम्* पुस्तक अग्रवाल समाज को खोज कर प्रस्तुत की थी । *1938* में पहली बार अग्रवालों का इतिहास विषय पर *डॉ. सत्यकेतु विद्यालंकार* ने एक शोध प्रबंध प्रकाशित करवाया था । यह दोनों कार्य ही अब तक महाराजा अग्रसेन के संबंध में सर्वाधिक प्रामाणिक आधार माने जाते रहे हैं। *उरु चरितम* डॉक्टर सत्यकेतु विद्यालंकार के शोध प्रबंध का ही एक अंग है। आचार्य विष्णु दास शास्त्री द्वारा लिखित श्री अग्रसेन भागवत इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है । *आचार्य जी को बहुत-बहुत बधाई ।*

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