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शिक्षा के सरोकार

शिक्षा के सरोकार

“सा विद्या या विमुक्तये” हमारे प्राचीन मनीषियों ने विद्या को मुक्तिकारक बताया है।अर्थात,विद्या वह है जो हमें अज्ञान से मुक्ति दिलाकर ज्ञानी बनाये,अंधकार से मुक्ति दिलाकर प्रकाशवान बनाये,हर बुराई के बन्धन से मुक्त कर हमें सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्ति की ओर अग्रसर करे।यदि ज्ञान हमें गर्त में धकेल रहा है तो वास्तव में वह ज्ञान नहीं बल्कि अज्ञान है।
आजकल की शिक्षा प्रणाली मनुष्य को शिक्षा के सर्वोच्च लक्ष्य एक संवेदनशील और जागरूक नागरिक बनाने से मानो भटक गयी है।वर्तमान शिक्षा बालक को बड़ा होकर केवल पैसा छापने की मशीन में परिवर्तित करने में जोर दे रही है और इसके पीछे उत्तरदायी है पश्चिम का अंधानुकरण कर अपनायी गयी उपभोक्तावादी संस्कृति।
जिसके कारण महँगे पंचसितारा होटलनुमा विद्यालयों में दाखिले की होड़ अभिभावकों में बढ़ती जा रही है,क्योंकि ऐसा मिथक समाज में बन गया है कि मँहगे विद्यालय से पढ़ा हुआ बालक ही समाज में प्रतिस्पर्द्धा कर सकता है और ऊँचे पद पर आसीन हो सकता है,अच्छा सालाना पैकेज उसे मिल सकता है।इसके लिए अभिभावक हर जुगत लगाता है,जिससे भ्रष्टाचार व्यापक होता चला जा रहा है।सभी इस अंधी दौड़ में शामिल हुए चले जा रहे हैं।और परिणामतः समाज में डॉक्टर,इंजीनियर,बैंकर,मैनेजर,पेशेवर व्यवसायी और कैशियर जैसी प्रजातियाँ तो बहुतायत में मिलने लगी हैं परन्तु इंसान गुम हो गये हैं।यह एक भयावह सच्चाई है।
इंसानों के गुम होने का एक दुष्परिणाम यह हो रहा है कि अमीरी गरीबी के बीच की खाई निरन्तर चौड़ी होती जा रही है।साधन सम्पन्न जहाँ शिक्षा को ऊँचे दामों में खरीद रहे हैं वहीं गरीब केवल वोट बैंक बना हुआ है और मुफ्त में मिल रही शिक्षा से भी उसे कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि वह जानता है कि इसके बलबूते वह प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर सकता और यदि पढ़ लिख गया तो फिर खेतों में मेहनत करके रोटी कमाने लायक भी नहीं रहेगा।सरकारों को शिक्षा के इन दो स्वरूपों अमीर की शिक्षा और गरीब की शिक्षा को हटाकर केवल और केवल भारत के सुन्दर भविष्य हेतु भारत के सभी बालकों की शिक्षा में एकरूपता लानी होगी और शिक्षा के उच्च लक्ष्यों की पुनर्स्थापना करनी होगी।
जब तक शिक्षा का सर्वोच्च लक्ष्य मानव निर्माण नहीं होगा तब तक आदर्श और सभ्य समाज की कल्पना बेमानी है।समाज में आज हम चारों ओर जो अराजकता,भ्रष्टाचार,अनाचार हर क्षेत्र में व्याप्त देखते हैं उसका मूल कारण ही यह है कि शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से भटक गयी है।
अब भी वक्त है अगर सरकारें अपनी पूरी क्षमता से शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियों का समय रहते उपचार कर लें तो भविष्य में एक आदर्श समाज के निर्माण का स्वपन देखा जा सकता है।
✍हेमा तिवारी भट्ट✍

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