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वृक्ष की अभिलाषा

भूल जावोगे गिनती, अनगिनत है, मेरे काम।
क्या कभी चुकाओगे, कितने ऋण तेरे नाम।।
सुबह की सैर भी, करते आकर मेरे पास।
सावन के झूलो में भी, चुनते शाखाएँ खास।।
फल फूल को छोड़ो, प्राणवायु सींचता हूँ।
औषधियां संजीवनी, जीवन आयाम देता हूँ।।
हरी हो धरती प्यारी, मैं बादल बुलाता हूँ।
मिटाता हूँ, आतप, अन्न जल वायु दाता हूँ।।
चाह नहीं है मेरी, सबका शीश झुकाऊँ।
चाह नहीं है मेरी, पूजा जाऊँ और इठलाऊँ।।
बस चाह है, मेरी, निःस्वार्थ सेवाभाव जगाऊँ।
जिओ और जीने दो, सहिष्णु मनुज बनाऊँ।।
(रचनाकार@ डॉ. शिव ‘लहरी)

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