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विनोद सिल्ला के दोहे

विनोद सिल्ला के दोहे

खेल जगत के अजब हैं, अजब सभी हैं काम।
रहा अकेला उम्र-भर, मरे तो जुड़े गाम।।

हाल-चाल पूछा नहीं, ना बोला दो बोल।
अपनी-अपनी अकड़ में, भूले हँसी मखौल।।

नहीं उम्र भर खा सका, भोजन जो भरपेट।
मृत्यु-भोज में लोग हैं, खाएं भर-भर प्लेट।।

जीवन भर भूखा रहा, गई भूख में जान।
कर्जा ले कर ही किया, कुनबे ने गौदान।।

जीते जी खाई नहीं, मेवे मीठी खीर।
खिलाते उसे श्राद्ध में, अपना जीवन चीर।।

जीवन जीया रंक का, सिले नहीं परिधान।
आज अर्थी पर चढ़ रहे, नए थान के थान।।

विनोद सिल्ला खेलिए, जीवन बाजी खेल।
जीते जी ही मदद कर, जीते जी का मेल।।

-विनोद सिल्ला

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