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वाह-वाह पर्यावरण (व्यंग्य)

हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाए जाते हैं। मानसून पूर्व बारिश और मानसून पश्चात का लगभग समय यही है और प्रकृति हरीभरी हो जाती है, क्योंकि जेठ आते ही वर्षा हेठ यानी उतर आती हैं, ऐसा ग्रामीण कहावत है।

मानसून पूर्व बारिश यानी आँधी-तूफान लिए मूसलाधार वृष्टि के साथ जो आपदा बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड और उड़ीसा के लोगों के ऊपर आयी है, यह उसी भाँति है, जैसे- कहते है न कि एक तो करेला, दूजे नीम चढ़ाय। इसके साथ ही यह भी कहावत यहाँ सटीक बैठती है, यथा- कोढ़ में खाज ।

यास के छाते ही जनजीवन त्रस्त हो गई है, त्राहिमाम हो गई है। तेज हवा के साथ यह जो चक्रवात है, जिनसे बाढ़ की स्थिति आ सकती है, तो आम-लीची के फलों को क्षति पहुँचा सकती है। कच्चे मकान क्षतिग्रस्त हो गए हैं, तो यातायात के साधन ठप हो गए हैं। यह है प्रकृति की मार। पहले टेक्टो, अब यास। विश्व पर्यावरण दिवस की जय हो। वाह-वाह पर्यावरण !

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