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Jul 20, 2016 · 2 min read

वर्चुअल इश्क़

वर्चुअल इश्क़
उधर तुम चैट पर जल रही होती हो कभी हरी तो कभी पीली और इधर वो तो बस लाल ही होता है. ऐप्स के बीच में फंसी जिंदगी वह जाना भी नहीं चाहता था और जताना भी नहीं. वो जितने ऐप्स डाउनलोड करता वो उतना ही दूर जा रही थी. अब मामला हरे और लाल का नहीं था अब मसला जवाब मिलने और उसके लगातार ऑनलाइन रहने के बीच के फासले का था.
स्मार्ट फोन की कहानी और उसकी कहानी के बीच एक नई कहानी पैदा हो रही थी. उसने स्माइली का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, पर दिल की भावनाओं को चंद चिह्नों में समेटा जा सकता है क्या? रियल अब वर्चुअल हो चला था. दो चार स्माइली के बीच सिमटता रिश्ता वो कहता नहीं था और उसके पास सुनने का वक्त नहीं था, ऐप्स की दीवानी जो ठहरी. सब कुछ मशीनी हो रहा था. सुबह गुडमार्निंग का रूटीन सा एफ बी मैसेज और शाम को गुडनाइट.
दिन भर हरी और पीली होती हुई चैट की बत्तियों के बीच कोई जल रहा था तो कोई बुझता ही जा रहा था. काश तुम टाइमलाइन रिव्यू होते जब चाहता अनटैग कर देता. अक्सर वो सोचता रहता. वो तो हार ही रहा था पर वो भी क्या जीत रही थी. कुछ सवाल जो चमक रहे थे चैट पर जलने वाली बत्ती की तरह रिश्ते मैगी नहीं होते कि दो मिनट में तैयार. ये सॉरी और थैंक्यू से नहीं बहलते इनको एहसास चाहिए जो वॉट्स ऐप्प और वाइबर जैसे एप्स नहीं देते उसे तो आगे जाना था पर ये तो पीछे जाना चाहता था जब रियल पर वर्चुअल हावी नहीं था.
क्या इस रिश्ते को साइन आउट करने का वक्त आ गया था या ये सब रियल नहीं महज वर्चुअल था. वो हमेशा इनविजिबल रहा करता था वर्चुअल रियल्टी की तरह जहां है, वहां है नहीं… जहां नहीं है, वहां हो भी नहीं सकता. वो इनविजिबल ही आया था और अब इनविजिबल ही विदा किया जा रहा था. शायद ब्लॉक होना उसकी नियति है. अब वो जवाब नहीं देती थी और जो जवाब आते उनमें जवाब से ज्यादा सवाल खड़े होते. चैट की बत्तियां उसके लिए बंद की जा चुकी थी. इशारा साफ था अब उसे जाना होगा साइन आउट करने का वक्त चुका था. वर्चुअल रियल नहीं हो सकता, सबक दिया जा चुका था. जिंदगी आगे बढ़ने का नाम है पीछे लौटने का नहीं.

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