Sep 4, 2016 · 1 min read

रौशनी तम निगल रही होगी

रौशनी तम निगल रही होगी
रात चुपचाप ढल रही होगी

देखकर अपनों के महल ऊँचें
मुफलिसी और खल रही होगी

हैं नज़र तो झुकी झुकी लेकिन
प्रीत दिल में मचल रही होगी

मुस्कुरा कर विदा किया होगा
आँख लेकिन सज़ल रही होगी

लग गले फिर पुरानी यादों के
नींद आँखों को छल रही होगी

देख कर जख्म ‘अर्चना ‘मेरे
पीर भी पी रही गरल होगी
डॉ अर्चना गुप्ता

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