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रचा नहीं कोई गीत नया

हुए बहुत दिन सुनो दोस्तो,
रचा नहीं कोई गीत नया ।

किसी साँप की तरह रेंगता,
ग़ुजर रहा है , दिन मेरा ।
विच्छू जैसा डंक उठाये ,
अस्थिर है , मेरा डेरा ।
कछुए जैसा सिर भीतर कर,
मैं चुपचाप चला जाता हूँ ,
कहीं कभी भी कोई मिलेगा,
मेरे मन का मीत नया ।

छिपकलियों-सा लगा भीत पर,
ज़हरीले दिन का पहरा ।
तिलचट्टे-सी रात ग़ुजरती ,
अंधकार होता गहरा ।
दीमक जैसा चट कर जाता,
मेरे मन की गहराई ,
कहीं थाह न मिलती मुझको,
कहीं न मिलता प्रीत नया ।

चमगादड़-सा उलटा लटका ,
मेरे मन का लक्ष्य यहाँ ।
गिरगिट जैसा रंग बदलता ,
मेरा हरएक मित्र जहाँ ।
किसी लीख-सा मैं चिपका हूँ,
असमय पकते बालों से ,
फिर भी हिम्मत है,आशा है ,
मन को होगा दीद नया ।

कुत्ते जैसा पूँछ हिलाता ,
खोई वफ़ा मैं सूँघ रहा हूँ ।
उल्लू-सा मैं सुंदर रातें ,
व्यर्थ जाग कर ऊँघ रहा हूँ।
कभी खिलेंगे फूल बाग में ,
कभी चलेगी हवा यहाँ ,
तेरी ! करूणा जब बरसेगी,
बन जाएगा गीत नया ।

हुए बहुत दिन सुनो दोस्तो,
रचा नहीं कोई गीत नया ।

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