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यथा प्रदीप्तं ज्वलनं.…..

संसारस्य वियोगः नित्यं च संयोग: अनित्यं च।संयोगेन पूर्व अपि वियोगः।पश्चात् अपि वियोगः भविष्यति च वर्तमानकाले अपि प्रतिक्षणं वियोगः भवति।परमात्मनः योगः नित्यं।संसारस्य संयोगे समानता बहु: त्रुटि:।यतोहि एषः संयोगः शाश्वत न।बालकः जन्मस्य पश्चात् किं करिष्यति, किं न करिष्यति।सर्वासु वार्तासु सन्देह:।परं सः मरिष्यति एतस्मिन् कः अपि संन्देह: न। संसारः स्वतः प्रकृत्यां विलीनं भवन् अस्ति च तत्वज्ञ: प्रेमी महापुरुष: निरंतर: परमात्मनि गच्छन् अस्ति।भोग: च संग्रह: च इच्छाकर्ता जनाः पतंगस्य सदृशः।ये अग्न्या भस्म: भवने सति गच्छन् अस्ति-“यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशय समृद्धवेगाः”(गीता-11/29)

©®अभिषेक:पाराशर

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