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मैं बिल्कुल अकेली लड़की

हो गई हूँ अकेली ?
यहाँ न आती माँ-बाबा की
‘पढ़ने बैठो’ की आवाज़ें,
न भैया की डाँट,
न छोटे भाई-बहन का प्यार,
अचीन्हीं यहाँ की
घर की दीवार भी।
न यहाँ आँगन पर
खटर-पटर,
कैसे हम खेला करते थे
संग-संग,
गुल्ली-कबड्डी
खो-खो और अन्य रंग।
बाबा की अँगुली थाम बढ़ी,
माँ की आँचल बनी सौगात,
कैसे माचिस की
तीली-सी छोटी थी,
क्यों बेवक्त अँगारे बन गयी
बना दी गयी।
अब तो है,
मेरी बढ़ती उम्र से घृणा,
पर, माँ-बाबा की
बढ़ती उम्र से भय,
और ढलती काया से
भयावहता,
अब तो दादा-दादी भी नहीं है–
हम छह जने हैं
चार भाई-बहनें
चारों अपनी-अपनी
सेवा में व्यस्त,
चारों कुँवारे
भैया 46 पार ,
मैं 40 पार।
परेशाँ माँ-बाबा
क्या यही है,
जिंदगी का सार ।
परिवार बसाना –
क्या है जरूरी ?
परिवार तो
मीराबाई भी बसाई थी,
सोचती–
कई भेड़िऐं से अच्छा है
एक भेड़िया में टिक जाऊँ !
एक स्त्री–
एकाकीपन से
क्यों है घबराती ?
या पुरुषों को भी
ऐसा ही भय है सालता !
अनलिमिटेड ज़िन्दगी,
बन गई है ‘वनवे ट्रैफिक’
ख़ुशी तो इस बात की है
यही सोच–
समस्या नहीं यहाँ कोई,
‘ट्रैफिक-जाम’ की,
क्योंकि मैं बिल्कुल
अकेली हूँ,
नितांत अकेली !

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