मैं कवयित्री नहीं हूँ

………………..मैं कवयित्री नहीं हूँ…………………

मैं कोई कवयित्री नहीं हूँ अरे मैं कोई कवयित्री नहीं हूँ
कवयित्री की कलम तो निस्वार्थ भाव से चलती है
सोये हुए इंसानों को जगाकर उनमें नई जान फूंकती है
पर मैं तो सच में स्वार्थभाव से लिखती रहती हूँ कुछ कुछ
कभी श्रृंगार रस में तो कभी प्रेमरस में गढ़ती रहती हूँ कुछ कुछ
कुछ लोगों के भूरी भूरी प्रशंसा करने से खुश हो जाती हूँ मैं
इस झूठी प्रशंसा से ही खुद को स्वार्थ में डुबो जाती हूँ मैं
भूल कर अपने धर्म को महज वाहवाही लूटने को कलम चलाती हूँ
लिख चंद अल्फाज रस भरे मैं लोगों की वाहवाही लूट पाती हूँ
अपने को कवयित्री कहने में झिझक महसूस करने लगी हूँ
सच कहूँ अपने बनावटीपन से मैं अब खुद ही अखरने लगी हूँ
बहुत हुआ अब अपने लक्ष्य से नहीं भटकना है मुझे
दूसरों को जगाने के लिए पहले खुद जगना है मुझे
अब हर लम्हा जिंदगी का लेखन को समर्पित करना होगा
फूंक नई जान दूसरों का दामन भी खुशियों से भरना होगा
सुलक्षणा इतिहास रचना है दिन का चैन रातों की नींद गवाँनी होगी
जलाकर चूल्हा हर रोज चंद घरों में दो वक़्त की रोटी खानी होगी

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