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मेरे दृगो से दूर ही रहो अश्रु विन्दु की धारा

मेरे दृगो से दूर रहो हे अश्रु विन्दु की धारा
पता चल चुका बाधाओ को भी थककर हारा
बढ रहे कदम नित पथ पर मिल रहा इच्छित सारा
कभी मिलेगा अवसर तुमको यह सोच रहा थक हारा
चलते चलते दुर्गम पथ पर मिलता शीतल जल धारा
प्यास बुझी मन श्रांत हीन मिल गया मुझे किनारा।

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