मेरा ठिकाना-९ —मुक्तक—डी के निवातियाँ

मैया कहे परिलोक से आयी, कुंवर देश तोहे जाना
पराया धन मेरे आंगन जिसे ब्याज समेत चुकाना
ससुराल में सब ताने मारे, तू अपने मायके जा ना
बिटिया बाबुल से पूछे आखिर कँहा मेरा ठिकाना !!
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डी. के. निवातियाँ _______@

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