कठिन है जीवन की डगर

संभलकर चलना पड़ता है
जब बाहर निकलते हो घर से
कदम कदम पर भ्रम है
जब बाहर निकलते हो घर से।।

तुम क्या चाहते हो, क्या सोचते हो
कोई फर्क नहीं पड़ता है किसी को
मदद करेगा तभी कोई तुम्हारी
जब कोई फायदा होता हो किसी को।।

एक दो मुलाकात से तुम
किसी को पहचान नहीं पाओगे
दिल में छुपा है क्या किसी के
कुछ भी तुम जान नहीं पाओगे।।

अच्छा ही लगता है शुरू में हर कोई
छुपा है दिल में क्या, बताता नहीं कोई
जो संभलकर चलोगे जीवन की राह
जबरन राह से भी, भटकाता नहीं कोई।।

जो भटक गए एक बार इस राह से तुम
मुश्किल हो जाती है जीवन की डगर
सही गलत नज़र नहीं आता हमें फिर
भटक जाए एक बार जीवन की राह अगर।।

किसी इच्छा को पूरा करने के लिए
जो सुलभ राह हम अपनाते है
उसके लिए बाद में हम अवश्य पछताते है
ऐसा बड़े बुज़ुर्ग हमें बतलाते है।।

संभलकर चलना ये जीवन की डगर
देखकर ही बढ़ाना कोई भी कदम
जो हो अगर खुद पर विश्वास तुम्हें
कोई नहीं रोक सकता तुम्हारे कदम।।

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