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Jun 14, 2022 · 1 min read

मुक्तक

मायने खुबसूरती के बदलने लगें हैं
खोंटे सिक्के भी अब चलने लगें हैं ।
-अजय प्रसाद

पछता रहे हैं पाँव सफ़र के बाद
याद आ रहें हैं गाँव शहर के बाद।
काट कर दरख्तों को बनाए रास्ते
ढूंढ रहे हैं हम छाँव शज़र के बाद।
-अजय प्रसाद

बहस,विवाद,औ विरोध का तरीका बदल गया
इन्सान और इंसानियत का लहज़ा बदल गया ।
मसले मुल्क के महफ़ूज़ रहतें हैं रहनुमाओं से
आजकल तो रहनूमाई का सलीका बदल गया ।
-अजय प्रसाद

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