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Mar 20, 2019 · 1 min read

मुक्तक

“मौन थी मेरी कलम उसको रवानी दे गये,
जाते-जाते मुस्करा कर इक निशानी दे गये,
जिनके आने से बढ़ी थीं रौनकें चारों तरफ,
देश के खातिर वो अपनी ज़िन्दगानी दे गये “

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