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Mar 3, 2019 · 1 min read

मुक्तक

” निज भावों को लिख देती हूँ, जब सुनती हूँ लोगों की बात,
मन व्यथित मेरा हो जाता है , जब अपने मुझसे करते घात,
लेखन में ही जीवन बसता , लेखन में बसते मेरे प्राण,
कलम हमारी मैदाने जंग , झेल रही नित दिन शह – मात “

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