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23 Jul 2022 · 1 min read

मिटाने लगें हैं लोग

मिटने लगे हैं लोग मिटाने लगें हैं लोग
औकातअपनी ज़िद की दिखाने लगें हैं लोग

साँसों के सियासत की बहस हो रही ऐसे
अब झूठ को ही सच से बचाने लगे हैं लोग

डरने लगें हैं सुन के अस्पताल लफ़्ज को
बीमार भी फिट ख़ुद को बताने लगे हैं लोग

इंसानियत को पीके कर रहें हैं उल्टियाँ
हैवानियत को ऐसे पचाने लगें हैं लोग

लगता है हवा खाँसती है छींकती घटा
बागों में भी मुखौटे लगाने लगें हैं लोग
..
कुछ भी नही बचा है तिज़ारत की नज़र से
यह जानकर हँसी भी छिपाने लगें हैं लोग

पैसा ही ‘महज़’ साँस ज़माने में आज है
ख़ुदगर्ज़ियाँ यूँ दिल में बसाने लगें हैं लोग

Language: Hindi
1 Like · 72 Views
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