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मार्मिक फोटो

जेठ का महीना और चिल्लाती धूप।शेरू जहाँ भी जाता, लोग उसे भगा देते। कोई भी उसे अपने आस-पास बैठने नहीं दे रहा था।बेचारा बहुत परेशान था।जब बरामदे में बैठे बस का इंतजार कर रहे लोगों से कुछ दूर पर आराम करने की कोशिश की तो एक सज्जन ने आकर जोरदार एक लात पेट पर मार दी।दर्द से कराहता कूँ-कूँ करता वहाँ से भाग खड़ा हुआ।
उसने देखा तेज धूप में कंधे पर बैग टाँगे एक मोटा-तगड़ा व्यक्ति खड़ा बस का इंतजार कर रहा है।उसकी परछाई दूर तक छाया कर रही थी। शेरू ने सोचा, इस परछाई में आराम किया जा सकता है।दूध का जला छाछ भी फूँककर पीता है, इस कहावत को ध्यान में रखते हुए उसने पूछ लेना जरूरी समझा। शेरू को डर लग रहा था कि जब छाया में बैठे लोग उसे लात मारकर भगा सकते हैं तो चिलचिलाती धूप में खड़ा व्यक्ति तो उसे जान से ही मार देगा। पर मरता क्या न करता।”अविश्वास के माहौल में भी विश्वास तो करना ही पड़ता है। बिना विश्वास के तो जीवन चलता नहीं है।”
उसने पास जाकर कहा- “साहब, साहब” आपसे एक मदद चाहिए।
व्यक्ति ने इधर-उधर गर्दन घुमाकर देखा , आस-पास तो कोई है नहीं ,फिर आवाज कहाँ से आ रही है?
शेरू ने कहा, “साहब नीचे देखिए। कोई व्यक्ति नहीं ,बल्कि मैं आपको आवाज दे रहा हूँ।मैं थोड़ी देर आपकी इस परछाई में बैठकर आराम करना चाहता हूँ।
“लेकिन मेरी परछाई में क्यों?” “कहीं किसी पेड़ की छाया में या बिल्डिंग के अंदर भी तो अपने आपको धूप से बचा सकते हो।”
“बात तो आप सही कह रहे हैं, पर मुझे कोई व्यक्ति अपने आस-पास बैठने ही नहीं देता।जहाँ भी जाता हूँ, लोग भगा देते हैं।” आप देख रहे हैं , यहाँ सिर्फ दो ही छोटे-छोटे पेड़ हैं। उनके नीचे बहुत भीड़ है और बरामदे में तो लोगों की बाढ़-सी आई हुई है।”
“ठीक है, कोई बात नहीं। जब तक मैं यहाँ पर खड़ा बस का इंतजार कर रहा हूँ,तुम मेरी परछाई में आराम कर सकते हो।”
शेरू ने कृतज्ञता भाव से पूँछ हिलाई और बैठकर आराम करने लगा।
एक व्यक्ति ने इस मार्मिक दृश्य को देखा तो अपने कैमरे में कैद कर लिया।उसे लगा कि यह दृश्य न केवल इंसान और जानवरों के आपसी संबंधों को दर्शा रहा है ,साथ ही विकास के नाम पर प्रकृति के साथ की जाने वाली छेड़-छाड़ के दुष्प्रभाव की ओर भी इंगित कर रहा है।

डाॅ बिपिन पाण्डेय

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