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Jul 13, 2022 · 1 min read

मोरे मन-मंदिर….।

मोरे मन-मंदिर में कभी यूं भी आओ कान्हा ।
गूंजे धुन मधुर तुम बांसुरी बजाओ कान्हा ।।

हाथ जोड़ चरणों में बैठूँ,
मन भक्ति में रम जाये ।
तेरे बिन कुछ याद रहे न,
ऐसी भक्ति मिल जाये ।
देकर अपनी भक्ति पावन,
मन की पीर मिटाओ कान्हा ।।
मोरे मन-मंदिर…..।

सांझ- सवेरे मन के भीतर,
बस तेरी छवि निहारूँ।
साथ तेरा ऐसा मिल जाए,
दुनिया को मैं बिसारूँ ।
आकर मुझको रंग में अपने,
कुछ ऐसे रंग जाओ कान्हा ॥
मोरे मन-मंदिर……।

रचनाकार :- कंचन खन्ना, कोठीवाल नगर,
मुरादाबाद, (उ०प्र०, भारत)।
सर्वाधिकार, सुरक्षित (रचनाकार)।
दिनांक :- ०८.०१.२०१६

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