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26 Nov 2023 · 1 min read

मंज़र

अनजान हैं मेरे जो मंज़र से,
दिये हैं ज़ख्म वही तो खंजर से
बाहर से उसको अन्दाज़ा नहीं,
टूट गया हूँ बहुत मैं अन्दर से,

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