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भैया बहना प्रेम का,अनुपम धागा नेह का

संप्रेषित एक रचना:—-

छंद– उल्लाला/ चंद्रमणि ( मात्रिक )
शिल्प विधान 13 मात्रा

भैया बहना प्रेम का,
अनुपम धागा नेह का।
पावन भैया दूज यह,
पर्व अनूठा स्नेह का।

खुद कंजूसी में रहे,
भाई को दूलार दे।
खुद को चाहे नहिं मिले,
भैया को नित प्यार दे।।

माथे पर करके तिलक,
नित करती यह कामना।
होवे जीवन बस सुखद,
रखती मन में भावना।।

मांगे बस एकहि वचन,
भैया झोली में भरो।
मुझ पर जब भी भीर हो,
तुम मेरी रक्षा करो।।

?अटल मुरादाबादी ?

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