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18 Aug 2016 · 1 min read

भीड़ में तुम दिख जाते हो…

बगिया में अपनी जब कुछ फूल सजाता हूं,
भीड़ में तुम दिख जाते हो।

अपनी कलम से जब कुछ शब्द बनाता हूं,
भीड़ में तुम दिख जाते हो।

रंग देता हूं खुशनुमां महफिल दीवानों की नगरी में,

उस महफिल में जब प्यार की गज़ल सुनाता हूं,
भीड़ में तुम दिख जाते हो।

— प्रियांशु कुशवाहा,
सतना

(इस मुक्तक में तीनों पंक्तियों की भीड़ अलग-अलग है–
–पहली पंक्ति में फूलों की भीड़ है
–दूसरी पंक्ति में शब्दों की भीड़ है।
–आखिरी पंक्ति में श्रोताओं की भीड़ है। )

Language: Hindi
366 Views
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