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” भाषा”

” भाषा”

–सीरवी प्रकाश पंवार
शरू कहा से करू थोडा मुश्किल तो हैं। वैसे हमेशा अकेला चलना पसंद करता हूँ पर आज डर लग रहा हैं। बात आजादी कि करे तो व्यक्त करने की आजादी, देशविरोधी नारे लगाने की आजादी, सेना पर पत्थर फैकने की आजादी जैसी बातें बहूत बार हो चुकी हैं। परन्तु ये आजादियों की लड़ाईया राजनीति से जुड़ी थी तो इन पर बात करना उचित भी नहीं हैं।
हालाँकि मेरा मानना यह हैं कि इंसान जो भी करता या प्राप्त करता हैं वो उसकी सोच और समय पर निर्भर करता हैं। और अगर इंसान बदलता हैं तो उसकी सोच बदलने से ही होता हैं।
एक सवाल अपने आप से करो कि अगर आप की सोच के आगे मनगढंत नियमों की लकीरे बना दे तो आप क्या महसुस करेंगे। ऐसी ही बात भाषा को लेकर मेरे मन मै उठती है कि मै जिस राष्ट्र में रहता हूँ उस राष्ट्र की भाषा में मुझे पढ़ने नहीं दिया जाता। उस भाषा में मुझे सोचना तक मंझूर नहीं क्योकि अगर उस भाषा की राहे मेरी मंझिल तक की नही हैं। अगर सोचा तो उदेश्य से गद्दारी।और अगर उदेश्य से गद्दारी मतलब आपने अस्तित्व या अम्मा-अप्पा से गद्दारी। साहब आप तो बोलते हो ना की समानता का अधिकार तो हैं कहा आपकी समानता। कौनसे राष्ट्र के सविधान में लिखा हुआ हैं कि आपको अपनी पूरी पढ़ाई अंग्रेजी में करनी पड़ेगी। अगर हम अपनी राष्ट्र भाषा में कुछ सीखते हैं तो इसी राष्ट्र के लिए करेंगे और कही और जाने की ज़रूरत भी नहीं होंगी। साहब विद्या के घरो में लकीरे बना दी गयी हैं कि अगर आप अंग्रेजी के हो तो आप को इस स्तर तक पढ़ाया जाएंगा और अगर आप हिंदी के हो तो आपको इस स्तर तक ही पढ़ाया जाएगा। यही से इंसान का आत्मबल और मनोबल टूट जाता हैं।
मुझे एक अध्यापक महोदय के कुछ शब्द याद हैं कि “अगर आप खुद को सफ़ल युवा की तरह देखना चाहते हो तो आपको इंग्लिश सीखनी पड़ेंगी।”आख़िरकार ऐसा मापदंड उस अध्यापक के दिमाग में क्यों आया?

ऐसा ही इतिहास एक महत्वपूर्ण प्राचीन भाषा “संस्कृत” का भी हैं। जो लगभग लुप्त होने की कगार पर हैं। और आजकल कही मज़ाक बनाने के कम में भी भूल से ली जाती हैं। यह विकास नहीं पतन हैं।

बात सविधान की अगर करे तो भारत का सविधान के अनुच्छेद ३४३ का खंड(१) तो यही कहता हैं कि देश आजाद होने के १५ साल बाद से हिंदी को बराबर महत्व मिले, तो फिर यह देश में आज क्या हो रहा हैं?

साहब यह जो हिंदी इंग्लिश का जो जाल बिछाया गया हैं उसमें प्रतिभा कही छुप कर रह जाती हैं। मज़ाक बना बना कर उस प्रतिभा का अंदर ही गला दबा दिया जाता। मेरा आज का असली मुद्दा ही यही था। और जब यह मेरे साथ ही हुआ हैं।

इंजीनियरिंग में कंप्यूटर प्रोग्रामिंग नाम का विषय चलता हैं।जिसमे मैने “radius” को जल्दी-जल्दी में गलती से “radious” लिख दिया था। जो आज तक मज़ाक बना हुआ हैं। और मज़ाक बनाने वाले पूरा प्रोग्राम मेरे से ही लिखते हैं। मुद्दा देख कर लिखने का नहीं हैं। मुद्दा मज़ाक का हैं।

और आज कल हम जब हिंदी का प्रयोग करते हैं तो ऐसा बर्ताव किया जाता है जैसे हम अनपढ़ हैं। पर साहब मै देश की भाषा बोलता हूँ, देश की भाषा में सोचता हूँ, और देश की भाषा का लेखक हूँ। और इसी बात का मुझे गर्व हैं।

मेरी किसी भी भाषा से कोई दुश्मनी नहीं हैं। मैने बस हक़ की बात बोली हैं। कि राष्ट्र भाषा हिंदी को अनिवार्य की जाए। भले ही आप दूसरी भाषा में कुछ भी करवाए पर वो हिंदी में होना ही चाहिए। जो की सविधान के अनुच्छेद ३४३ के खंड(१) में लिखा हैं।

“एक गुजारिश हैं तुमको कि थोडा धीरे चलो,

कोई पीछे रह गया हैं तुम मुड़ कर तो देखो,

अनपढ़ हैं वो कि हिंदी नही जनता,

हवा में हो तुम थोडा झुक कर देखो।”

–सीरवी प्रकाश पंवार

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