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बेबस पिता

*बेबस पिता*
“पापा आज ऑफिस से वापस आते समय मेरे लिए गुड़िया जरूर लाना। बहुत दिनों से आप वादा कर रहे हैं ,पर लाते नहीं।”
“आज पक्का अपनी गुड़िया के लिए गुड़िया लेकर आऊँगा।”
“पापा जी! पापा जी! मेरे लिए गुड़िया लेकर आए?” ऑफिस से वापस आए पिता से बेटी ने पूछा।
“नहीं बेटा, आज ऑफिस में काम ज्यादा होने के कारण वहाँ से निकलने में देर हो गई थी और रास्ते में साइकिल भी खराब हो गई थी,इसलिए बाज़ार नहीं जा पाया।” बहुत ही मायूस होकर उन्होंने अपनी पाँच साल की गुड़िया से यह बात कही थी।
पति की यह बात सुनकर पत्नी ने कहा, “क्यों बच्ची को रोज-रोज झूठा वादा करते रहते हो? बच्ची क्या सोचेगी?”
” बच्ची का दिल टूट जाता है,वह उदास हो जाती है।उसे कैसे बहलाती हूँ यह आपकी समझ में नहीं आएगा।”
उन्होंने झल्लाते हुए कहा- “अच्छा, तुमको क्या लगता है कि मैं अपनी बच्ची को गुड़िया लाकर देना नहीं चाहता, मैं उससे झूठे वायदे करता हूँ। अपनी बच्ची के चेहरे पर गुड़िया से खेलते हुए जो खुशी के भाव आएँगे मैं भी वो देखना चाहता हूँ। तुम समझती क्यों नहीं।” उनकी आवाज़ में बेबसी साफ झलक रही थी।
रात में बेटी के सो जाने पर उन्होंने पत्नी से बच्ची के लिए गुड़िया न ला पाने का कारण बताया तो उसकी आँखों में आँसू आ गए।
उन्होने बताया कि सच में उनकी साइकिल खराब हो गई थी, लेकिन दफ्तर से निकलने में उन्हें देर नहीं हुई थी।दफ्तर से तो वे समय से ही निकले थे। उनका बाजार जाकर गुड़िया लाने का विचार भी था। गुड़िया खरीदने के लिए अपने दोस्त से पचास रुपए भी उधार लिए थे। सोचा था पंद्रह रुपए मेरे पास हैं और पचास रुपए उधारी के, इतने में गुड़िया मिल जाएगी लेकिन सारे पैसे तो साइकिल की मरम्मत कराने में ही खर्च हो गए।
अब तुम्हीं बताओ मैं क्या करता? गुड़िया कैसे लाता? शाम को मुझे न तो तुम्हारे ऊपर गुस्सा आ रहा था और न अपनी गुड़िया पर। मुझे तो अपनी बेबसी पर गुस्सा आ रहा था।
डाॅ बिपिन पाण्डेय

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