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बेटी जो हँस दे तो कुदरत हँसती है।

*बेटिया*
सामाजिक बगिया में, गुल सम रहती है।
बेटी जो हँस दे तो, कुदरत हँसती है।

चिंताऐं हर रोज जकड़ लेती मन को।
पल में भोली सूरत हर्षा उठती है।

बाँह पसारे उठ -गिर- उठ चलने लगती।
मन तल पर बचकानी याद उभरती है।

कब उड़ने से रोक सकीं हैं सीमाऐं।
बेटी ‘पर’ से अंबर सीमित करती है।

किस देवी को पूज रहे दुनिया वाले।
घर में अंबा बेटी बन पग रखती है।

दौलतमंदों से तुम मत कमतर आँको।
सुता संपदा तो किस्मत से मिलती है।

अरे! तंज करने से पहले जग सुन ले।
बेटी तूफानों को चीर निकलती है।
————————————————–
अंकित शर्मा ‘इषुप्रिय’
रामपुर कलाँ, सबलगढ़(म.प्र.)

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