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बेटी के आर्त स्वर

*बेटियाँ*
मैं भी दुनियाँ देखन चाहूँ ,मुझको भी जिंदा रहने दो।
तड़पा दिल ममता को मेरा, मुझको मत तिल-तिल मरने दो।।

माँ, भगिनी, पत्नी बनकर, ममता ,प्रेम लुटाऊँगी।
‘माँ’ बेटे जब तज देंगे, हर पीड़ा स्वयं उठाऊँगी।
मैं बेटी हूँ भार यही ,क्या इतना सा ही दोष मेरा।
काँटों के पथ पर चलकर, पी जाऊँगी रोष मेरा।

बस दहेज के लालच में, बीजों को मत गिरने दो।
मैं भी दुनियाँ देखन चाहूँ ,मुझको भी जिंदा रहने दो।।1।।

विश्व कप या स्वर्ण पदक, बेटी ही हकदार बनीं।
मर्यादा की रक्षा में, बेटी ही तलवार बनीं।
देश वंश या दुनियाँ हो, नभ से सभी छुआए हैं।
किस लज्जा से दुनियाँ में, क्यों हम शीश झुकाए हैं।

मैं नहीं शिकायत करती हूँ, मुझको भी आगे बढ़ने दो।
मैं भी दुनियाँ देखन चाहूँ ,मुझको भी जिंदा रहने दो।।2।।

किसने समाज को मेरे व्याह, के सौदे का अधिकार दिया।
वेदों ने दुर्गा कहकर, जगती का आधार दिया।
कुछ बुरी निगाहें देख रहीं, क्या है डर इसका तुमको।
हर खतरे से लड़ पाने का, रब से सामर्थ्य दिया मुझको।

दायित्व पुत्र सम मेरा भी, मुझको भी गोद खेलने दो।
मैं भी दुनियाँ देखन चाहूँ ,मुझको भी जिंदा रहने दो।।3।।
अंकित शर्मा ‘इषुप्रिय’
रामपुरकलाँ, सबलगढ़(म.प्र.)

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