बारिशें

वो बारिशें अब कहाँ मयस्सर हैं,
जिनमें नादान शरारतें होती थी।
छतरी की छांव तले भी,
भीगने की कवायदें होती थी।

सर्दी जुकाम की परवाह किसे थी,
जब बादलों से मोहब्बतें होती थी।
पानी की हर बूंद के लिये,
घर घर में इबादतें होती थी।

खेतों के दिलों में आसमां से इश्क़ उमड़ता था ,
ये बूंदें ख़ुदा की इनायतें होती थी।
वो बारिशें कहां मयस्सर हैं,
जिनमें नादान शरारतें होती थी।

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