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बाबू जी

मुक्तक -*
दुनिया की करनी का रोना, किससे रोएँ बाबू जी।
पड़े हुए अंगार सेज पर , कैसे सोएँ बाबू जी।
छेनी और हथौड़ी लेकर,गढ़ने की कोशिश करता,
बंजर किस्मत में कर्मों को ,कैसे बोएँ बाबू जी।।
डाॅ. बिपिन पाण्डेय

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