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Sep 2, 2017 · 1 min read

बहुत कुछ बोलता हूँ ।।

लक्ष्य से भटकी हुई
एक नाव सा ।
पतझड़ी वन में,
मैं तरुवर ढ़ाक का
शांत बेसुध, सा खड़ा हूँ।
जिद्द जड़ों में आज भी है,
शेष मेरे ।
पथरीले भूगर्भ में
जल को खोजता हुँ ।
आग दिल में और
आशाएं समेटे
मौसमों की मार से
मैं खेलता हूँ।
पतझड़ी वन की
दहकती आग हूँ ।
उजड़ा हुआ हूँ ,
फिर भी मैं आबाद हूँ।
लगता हूँ ; सूखा ,नीरस
पर जिंदा हूँ ।
बरखा जो छू ले मुझे
तो डोलता हूँ।
जो थके है और टूटे ;
कभी संघर्ष में
अपने तराज़ू से मैं,
उनको तोलता हूँ।
मूक हूँ ; वन में मग़र
समझो………….??
तो
बहुत कुछ बोलता हूँ ।।

Sk soni ?

1 Like · 1 Comment · 202 Views
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