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Apr 6, 2022 · 6 min read

बहुत कुछ अनकहा-सा रह गया है (कविता संग्रह)

*पुस्तक समीक्षा*
*पुस्तक का नाम : बहुत कुछ अनकहा-सा रह गया है (कविता संग्रह)*
*कवि का नाम : प्रदीप गुप्ता*
*प्रथम संस्करण : लंदन 2022*
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*समीक्षक : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 99976 15451*
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प्रदीप गुप्ता की कविताओं का संग्रह लंदन से प्रकाशित हुआ है । शीर्षक है “बहुत कुछ अनकहा-सा रह गया है”। यह रचना धर्मिता मुरादाबाद के खाते में ही लिखी जाएगी क्योंकि कवि की संवेदनशीलता का बीजारोपण जन्म से ही माना जाता है। पुस्तक में “रामगंगा नदी और नाचनी गाँव” एक पुरानी अतुकांत कविता इस बात का प्रमाण भी प्रस्तुत करती है । मुरादाबाद में जन्में, तत्पश्चात मुंबई और लंदन के शिखरों का स्पर्श करने वाले कवि प्रदीप गुप्ता की कविताएँ उनके सामाजिक -राजनैतिक पैनेपन से भरी दृष्टि को जहाँ प्रतिबिंबित करती हैं ,वहीं दूसरी ओर शीर्षक के अनुरूप प्रेम के बिंब स्थान-स्थान पर बनते और बिखरते हैं । कहीं कवि की सामाजिक यथार्थ को तीक्ष्ण दृष्टि से भेदती आक्रोशित छवि मुखर होती है तो कहीं वह रूप के रस-माधुर्य में विचरण करता है ।
मुख्य रूप से इन कविताओं को इस प्रकार विभाजित कर सकते हैं । (1) सामाजिक हास्य-व्यंग्य (2) राजनीतिक व्यंग्य ( 3 ) संवेदनशीलता की प्रचुरता से ओतप्रोत प्रेम परक कविताएँ (4) पारिवारिक सामाजिक यथार्थ का चित्रण करती कविताएँ । अगर काव्य की विधा के अनुसार हम कविताओं का वर्गीकरण करें तो इनमें प्रमुखता गजलों को मिलेगी। गीतात्मकता से भरी कुछ कविताएँ भी हैं। अतुकांत कविताएं अपनी मार्मिकता से बहुत प्रभावी हैं । अंत में कुछ अलग-अलग देशों के प्रतिष्ठित कवियों की रचनाओं का अनुवाद कवि प्रदीप गुप्ता ने किया है। यह सब कुल मिलाकर कवि के चिंतन ,मनन और लेखन की व्यापकता को दर्शाते हैं। भारतीय परिवेश इन सभी कविताओं में मुखरित हुआ है , लिखा भले ही इन्हें कवि ने मुंबई या लंदन में बैठकर हो ।
सामाजिक हास्य-व्यंग्य की गजलों में अंग्रेजी शब्द का तुकांत बिल्कुल भी नहीं खटकता । यह आम बोलचाल की भाषा को हिंदी काव्य में सफलतापूर्वक प्रयोग में लाए जाने की कवि की क्षमता को दर्शाता है ।
न जाने कितने लोग बिना दोष सिद्ध हुए जेलों में सड़ रहे हैं । अदालतों में तारीख पर तारीख पड़ रही है और न्याय मीलों दूर है। इसे कवि ने कितने सुंदर शेर के माध्यम से व्यक्त किया है देखिए :-

*कितनी तारीखें पड़ी हैं याद है हमको नहीं*
*फीस मोटी ले रहे हैं लॉयर अब तक केस पर*

*बहुत सारे दिन बिताए उसने अपने जेल में*
*यह पता अब तक नहीं है वह गया किस बेस पर*
समाज में किस प्रकार जाति और मजहब के आधार पर व्यक्तियों की स्वतंत्रता का अपहरण हो जाता है ,एक शेर इस दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गया है:-

*अच्छे-खासे आदमी थे बन गए कठपुतलियाँ*
*नाचते हैं जातियों और मजहबों के नाम पे*
सामाजिक व्यंग की श्रेणी में ही कवि ने उन लोगों का भी जिक्र किया है जो मौकापरस्ती के साथ जीवन में सफल तो हो गए लेकिन आकर्षण तो उनमें ही है जिनके जीवन में सत्यवादिता रही । शेर देखिए:-
*हवा के रुख के साथ चले वो कामयाब लगे हैं*
*मगर जो सच के साथ चले वो मुझे नायाब लगे हैं*
नेताओं की भाषणबाजियों से जनता कितनी ऊब चुकी है ,इसको समय-समय पर लंबे-चौड़े लेखों के माध्यम से बताया जाता रहा है। “चुनावी ग़ज़ल” शीर्षक से एक शेर में कितनी सादगी से कवि ने यही बात अभिव्यक्त कर दी है। ध्यान दीजिए :-
*दरी कनात तंबू जो लगा रहा था मीटिंग में*
*कान में रुई डाली और वो पीछे जाकर बैठ गया*
कवि ने सामाजिक यथार्थ की वेदना को नजदीक से देखा और उसका चित्रण किए बिना नहीं रह सका। शिक्षा प्राप्त करना आज जितना सरल है ,आजादी के तत्काल बाद की परिस्थितियाँ उससे भिन्न थीं। देखिए :-
*कभी कॉपी कभी फीस तो कभी किताब नहीं*
*इस जद्दोजहद में अपना बचपन गुजर गया*
पारिवारिकता के महत्व को बताने में कवि पीछे नहीं रहा । आजकल जब एकल परिवार होने लगे हैं और लंदन में तो यह चित्र और भी गहरा है ,तब सचमुच संयुक्त परिवार को एक बड़ी पूँजी के तौर पर कवि ने ठीक ही रेखांकित किया है :-
*इस दौर में वह परिवार बहुत नसीब वाले हैं*
*जिनके बच्चों की जिंदगी में दादी है नानी भी है*
पुस्तक का शीर्षक जिस प्रेमपरक वक्तव्य को ध्यान में रख कर दिया गया है ,वह कविता समूचे संग्रह का प्राण तत्व कही जा सकती है। वास्तव में प्रेम मौन का ही पर्यायवाची होता है । प्रेम की सफलता और असफलता के बीच झूलता हुआ मनुष्य जब अपने विगत का स्मरण करता है ,तब बहुत कुछ मार्मिकता के साथ उसकी हथेली पर आ जाता है । इन्हीं भावों को कवि ने कुछ इस प्रकार कहा है :-
*बहुत कुछ अनकहा-सा रह गया है बीच में अपने*
*जिसे मैं चाह कर भी कह न पाया ,न कहा तुमने*
इसी अनकही व्यथा को व्यक्त करते हुए कुछ और शेर भी हैं जिनमें “रातों में क्या है” तथा “चंदन बिखर गया” शीर्षक गजलें विशेष रूप से पाठकों का ध्यान आकृष्ट करती है :-
*अगर तू नहीं है तो फिर मेरे ख्वाबों में और क्या है*
*तेरा अक्स जो नहीं तो मेरी आँखों में और क्या है*

*यह जरूरी नहीं कि वो हमेशा मुझसे बात करे*
*जब भी वो इस सिम्त आया चंदन बिखर गया*
संग्रह में अतुकांत कविताएँ यद्यपि संख्या की दृष्टि से कम हैं लेकिन अत्यंत मूल्यवान हैं। इनमें कवि की भावुक चेतना और चीजों को गहराई से देखने की उसकी परख सराहनीय है । यद्यपि इन कविताओं में हमें निजी और सार्वजनिक जीवन के कुछ चित्र देखने को मिलते हैं लेकिन यह चित्र इतने पारदर्शी बन गए हैं कि इनके भीतर का सारा सच मानो पाठकों के सामने आकर खड़ा हो गया है । एक ऐसी ही अतुकांत कविता देखिए, जिसमें कवि को अपने एक पुराने दोस्त से मुलाकात करने पर उसका चित्रण कुछ इस प्रकार करना पड़ा:-
*मिल गया एक पुराना दोस्त अचानक रास्ते में*
*उस पुरानी चाय टपड़ी पर गए जमाना हो गया था*
*याद आया सामने कॉलेज था लड़कियों का*
*कहीं आती-जाती टीचरों में आज पुरानी कई युवती दिखीं*
*दोस्त के चेहरे को देखा ,उस पर पाँच दशकों की परत थी*
*डेंचर नया था ,बस चबाने में उसे दिक्कत लग रही थी*
*बाल कुछ बाकी बचे थे जिनको फुर्सत से रंग लिया था*
पाठक महसूस करेंगे कि बहुत खामोशी के साथ कवि ने वास्तविकता को जो रंग दिए हैं, उनमें कहीं भी बनावटीपन नजर नहीं आता । यह एक बड़ी विशेषता है । *”पुरानी चाय टपड़ी”* शब्द का प्रयोग भी लोकभाषा में खूब हुआ है। झोपड़ीनुमा चाय की दुकानों पर बैठकर चाय पीने का अलग ही स्वाद होता था । कवि ने उसी रस को *टपड़ी* शब्द का प्रयोग करके जीवंत कर दिया है।
“रामगंगा नदी और नाचनी गाँव” में भी अतुकांत कविता के माध्यम से समाज का चित्रण करने में कवि का कौशल देखते ही बनता है।:-
*”दरअसल रामगंगा इस गाँव का कम्युनिटी सेंटर भी है । महिलाएँ यहाँ आकर नहाती हैं, कपड़े धोती हैं । अपने नन्हे मुन्ने को धूप सेंकने के लिए लिटा देती हैं । बच्चे स्कूल से दौड़ कर सीधे यहीं आ जाते हैं । पुरुषों के लिए तो यह क्लब है ।”*
अतुकांत कविताओं में ही “माँ बाबूजी” अपनी एक अलग ही छाप छोड़ती है। इस कविता में बूढ़े माता-पिता की समस्याओं को जहाँ दर्शाया गया है ,वहीं कवि ने एक स्थान पर सामाजिक चिंता को यह कहकर और भी गहरा बना दिया है कि:-
*अचानक वे दोनों महंगे लगने लगे हैं /*
*दवाओं के बिल भी बढ़ने लगे हैं*
विभिन्न देशों के कुछ प्रमुख कवियों की कविताओं के हिंदी अनुवाद से यह ध्वनि तो निकलती ही है कि विश्व पटल पर मनुष्य की चिंताएं सब जगह एक जैसी ही हैं। इस अनुवाद से कवि को एक चिंतक के रूप में भी देखा जा सकता है।
संग्रह की गजलें उर्दू भाषा के आधिक्य के कारण उर्दू की रचनाएँ ही कही जाएँगी। यद्यपि कठिन शब्दों के हिंदी अर्थ देकर कवि ने हिंदी पाठक की भाषा संबंधी समस्या का काफी हद तक समाधान कर दिया है ।संग्रह में अंग्रेजी के शब्द भी पराए नहीं लगते । वह आम बोलचाल में शामिल हो चुके हैं । अनेक स्थानों पर कवि की अपनी विशेष लयात्मकता है, जिसका माधुर्य पाठकों को पसंद आएगा । पूरी पुस्तक विश्व-समाज के उन मनुष्यों के लिए है जो अपने आसपास के वातावरण के प्रति सजग और सचेत हैं और जिन में इस दुनिया को बेहतर बनाने की कामना है।

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