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“बरसात हूँ विकास हूँ”

जन जीवन मुझे पुकार रहा,
मैं सबकी प्यास बुझाती हूँ,
ध्वनि की गति से आती,
जल राशि अपार लाती हूँ ।
वृक्ष हवा में लहराएंगे,
अपनी-अपनी प्यास बुझायेंगे,
मानव आलस खायेगा,
तो बाद-बाद पछताएगा ।
ये पानी जो बह कर जाता हैं,
सब नष्ट कर दिया जाता हैं,
खुद नहीं संभलता,
हम कब तक तेरे प्राण बचाएंगे ।
ये अंबर अब टूट रहा,
मेरी बस्ती लूट रहा हैं,
हाँ मानव तुमने आग लगाई हैं,
मैने अपनी काया खुद बचाई हैं।
मैं आती हूँ,
तो किसान का पेट भर जाता,
अमीर का का मूल्य बढ़ जाता,
गरीब भी पल जाता,
ऐसा है मेरा और इंसान का नाता।
मानव से एक शिकायत हैं,
बचा लो मुझे,
वन अब और न काटो,
बरसात हूँ पानी का साथ हूँ,
तुम्हारी सात पीढ़ियों के
जन्म से और आगे जन्म तक
सबका जीवन हूँ,विकास हूँ।

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