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23 May 2021 · 1 min read

बरसात की छतरी

रंग-बिरंगी छतरी आई,
छोटी-बड़ी लगे सुंदर-सी ।

रिमझिम-रिमझिम बरसात में,
बूंँदों से बचूँ आज मैं ।

टिप-टिप पानी टपक रहा है,
घन केश के छांँव में ।

भीग-भीग कर नहीं जाऊंँगा,
पढ़ने इस बरसात में ।

मांँ मुझको भी छतरी ला दो,
मस्त सावन की बौछार में ।

गोल-गोल घुमा कर इसको,
खुद को इसके नीचे छुप कर ।

जाऊंँगा अब बाहर मैं,
खूब करूँ पानी में छप-छप ।

ठंडी हवा से बचाऊँ इसको,
बरसात में खूब भिगाऊँ इसको ।

मांँ तुझको भी संग ले जाऊँ अब,
बरसात का एहसास दिलाऊँ तब ।

झूम-झूम कर मेघा बरसे,
रहेंगे छतरी के नीचे तन के ।

#..बुद्ध प्रकाश; मौदहा (हमीरपुर)

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