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फिर मुझे तुम याद करना

गुलमोहर इक प्रीत-सा
गुलमोहर मन-मीत-सा
जब तेरे आंगन लगाऊं
अंजुरी में नीर लेकर
सींचती उसको जतन से
फिर मुझे तुम याद करना ।
छोड़ धीरे बालपन को
तरूण होगा गुलमोहर जब
हरित कोमल डालियों को
कर-कपोलों से छुओ जब
अनुभूत करके उस छुअन को
फिर मुझे तुम याद करना ।
पेड़ की शाखों मेंं झूमें
ढेर-सी लघु पत्रिकाएं
पीताभ रक्तिम पुष्प से
देह-द्रुम जब वे सजाएं
देखकर खिलते कुसुम को
फिर मुझे तुम याद करना ।
वृक्ष को झूमें-झुलाएं
सरसराती-सी हवाएं
पुष्प जो आंगन में झरकर
गुल-गलीचे से बिछाएं
गुल-गलीचे बैठकर
फिर मुझे तुम याद करना ।
ग्रीष्म की तपती दोपहरी
गुलमोहर की छांव ठहरी
ओट से फिर झांकती तुम
गुलमोहर को ताकती तुम
हे प्रिय, कमलाभवर्णी
फिर मुझे तुम याद करना ।
– अशोक सोनी

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