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फिर भी नदियां बहती है

कितना कुछ सहती है,
फिर भी नदियां बहती है,

देती है हम सबको जीवन,
भुलाकर सब अपना दोहन,

खोद डाला हमने उनका सीना,
रेत मिट्टी कंकड़ सब कुछ छीना,

फिर भी निरंतर बहती है,
कुछ नहीं हमसे कहती है,

गंदगी जल में हम सब बहाते है,
जलीय जीवो को खूब सताते है,

हमे है लाभ से मतलब,
यह सोच बदलेगी कब,

निर्मल बहती नदी की धारा,
सिखाती करना परोपकार,

परहित से बढ़कर सुख नहीं,
कहते है सब वेद पुराण सही,

पर पीड़ा से बढ़कर पाप नहीं,
कह गए तुलसीदास बात सही,

नदियों को देवी हम मानते,
बात यह सब हम जानते,

आओ अपना कर्तव्य निभाए,
अब से गंदगी न हम फैलाए,
—- जे पी लववंशी

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