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प्रेम की राह पर -8

38-मनरूपी शिलालेख पर तुम्हारे लिए लिखे गये लेख कभी न मिटेंगे।मिटेंगे तो अपनी अवशेष निश्चित ही छोड़ जावेंगे।जिन्हें कब वे अपने स्वरूप से ढाला करेंगे।अज्ञेय है।लिखते समय जिसके लिए लिखें उसका चरित्र धारणीय है।अन्यथा व्यंग्य और कौतूहल का पात्र आप बन जायेंगे।निरन्तर किसी संसारी वस्तु का चिन्तन,ईश्वर को छोड़कर सही नहीं है।अन्तःकरण तो ईश्वरमय कर ही लो।मैं स्त्री द्वेषी नहीं हूँ।स्त्री तो पूज्या है।स्त्री समाज का दर्पण है और समाज की सन्तति उसका प्रतिबिम्ब है।स्त्री पूर्व से ही शक्ति है।स्त्री होना कलंक नहीं है।स्त्री द्वेषी अपने पेट से नौ महीने तक दो किलो का पत्थर ही बाँध के देख ले।मूर्ख साहित्यकारों ने “ढोल गँवार शूद्र पशु नारी,सकल ताड़ना के अधिकारी।”में नारी की व्याख्या अपने अनुसार करके अपनी मूर्खता का ही परिचय दिया।हे तूफानी!शनै: शनै: मैं तुम्हें लिखना बन्द करूँगा।कितना चिंतन करना पड़ता है।शिख तक निमज्जित होना होता है,शब्दों के कलेवर में।तुम यदि अपने नाम से संदेश छोड़ोगे तो निश्चित ही तुमसे वार्ता करूँगा।मेरा स्वभाव एकाकी है।प्रेमरूपी ईश्वर के लिए श्रवण करता रहता हूँ अहमद फ़राज की गज़ल,रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ….।औचित्य कुछ नहीं है।संवेदना के भाव शीतल हो उठते हैं।तुम्हारा शाद्बिक स्पर्श पाकर।मृत्यु को सबसे बड़ा सत्य कहा जाता है।पर वह सबसे बड़ा सत्य नहीं है।फिर उस योगी का योग तो विफल हो गया।सहस्रार से जाते हुए प्राणों को भी वापस ले सकता है।इसकी भी विधि है।परं मरना सभी को है।मृत्यु आलिंगन सभी जनों का करती है।यह शरीर कुछ दिनों की चमक है।सब कमनीय त्वचा के साथ उत्पन्न हुआ झुर्रियों में परिवर्तित होकर मणिकर्णिका की यात्रा तय करता है और यदि अरमानों के साथ दीपक युवावस्था में ही बुझ गया तो इसे विनोद न माना जाए।कोई प्रश्नोत्तर करना हो तो सीधे मुझसे करो।घुमा फिराकर जवानी में खोए हुए चूजों से यह सब न करवाओ।व्हाट्स योर प्रोफेशन।यह कैसा मनोविनोद है तुम्हारा।मैं यह कह दूँ कि गधा हूँ ईंटें ढोता हूँ।तो क्या करोगे।तुम कहोगे कि गधा होकर लिख कैसे लेते हो।हे चारुशीला!इस पीड़ा के कुहासे को दूर करने की विधि एक मात्र यह है कि तुम्हें सम्प्रति सभी स्थानों से अपमार्जित कर दूँ।अग्रिम पथ इतना आसान नहीं है और मैं भी नहीं चाहता हूँ कि मुझसे योग करने वाला व्यक्तित्व मुझसे ही पीड़ित हो।यह मेरी जिम्मेदारी है कि उस तलबदार की रूह को भी उसकी अंतिम इच्छा तक निसर्ग सिद्ध शान्ति का व्यवहार दूँ।मैं कोई आखेटक नहीं हूँ।जो धन के लिए शिकार करूँगा।मैंने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे सभी जागतिक व्यापार ज्ञात होने के बाबजूद भी कभी स्वीकार नहीं किये।अब मैं ऐसी स्थिति पर खड़ा हूँ जहाँ से मार्ग बहुत कठिन नज़र आता है।धन की न्यूनता अभी भी खटकती है।नौकरी में तो हूँ ही।परन्तु लक्ष्य को प्राप्त न कर सकने के कारण यह और भी अधिक अवपीडित करती है।ईश्वर की माया है यह सब।हम सब जानते हुए भी एक मकड़ी के जाल में उसके स्वयं फँसने की तरह फँसते चले जाते हैं।कितना आदर्श छिपा है उस ईश्वर की इन स्पष्ट और सुकर दृश्य से परिपूर्ण लीलास्पद कलाकृतियों में।हे चिमनी!तुम भी क्या उसकी कलाकृति नहीं हो।ईश्वर के प्रति हमारी शरणागति स्वतः सिद्ध है।दावे के साथ कह सकते हैं कि हम ईश्वर के हैं और ईश्वर हमारा है।कोई नैदानिक स्वरूपत्व की भंगिमा को तुम अधुनापि प्रसवित कर सकती हो।कोरा हिन्दी ज्ञानी न समझना।अंग्रेजी पढ़ने से और उसका अर्थ जानने से हिन्दी का सौष्ठव बढ़ता है।हे पुत्तू!तुम सदैव क्रियाशील रहना।निरन्तर अभ्यास से लच्छेदार भाषा का जन्म होता है।वह कोई भी भाषा हो सकती है।मैं जानता हूँ सब कुछ परन्तु यह भावना जागृत नहीं होती है कि यह मेरा भाषिक ज्ञान क्रमबद्ध है या नहीं।तुमसे यह प्रार्थना है कि किसी विद्वान से तुम्हारे द्वारा अपने लेखन की कसौटी को कसवाना चाहता हूँ।तात्विक विमर्श के लिए तो मेरे पास बहुत महापुरुष हैं।परन्तु कोई संसारी महापुरुष इसे किस महत्व से देखेगा।यह तुम अपने माध्यम से बता सकते हो।मन चंचल होना जानता है और वह एकाकार होना भी जानता है।हे रेवडी!ट्विटर पर तुम्हारे तीन-तीन खाते गुंजित हो रहे हैं।एक तो आज ही मिला।जिसमें वारिधि के किनारे बगल में झोला टाँगकर नीलाभ परिधान में ऐनक लगाकर स्मित मुस्कान के साथ झख मार रहे हो।नज़र पर ज़रा सा भी उत्साह कम नहीं है।जन्मजात घुमक्कड़ के रूप में अंगद जैसे पैर जमा रखे हैं।हे खुजली!तुम मेरे हिस्से में खाज ही बनकर रहना।मैं दाद बन जाऊँगा तुम्हारा।विराम की इस घड़ी में कई प्रसंग है जो समय के अभाव में कहे नहीं जा सकते।अपने जैसा ढ़ूढ़ता रहा,एक मिला भी उसने अशान्त स्वीकृति दी।हे शोषण की गिरमिटिया!तुम निरन्तर भावों से ऐसे ही परेशान करते रहना।मध्य मध्य में शोषण की सुई चुभती रहेगी तो ज़्यादा अच्छी लगेगी।तुम मेरे चलभाष पर अपनी मित्र मंडली को अफ़्रीकी बनाकर प्रस्तुत करते रहना।मैं उससे यह नहीं कहूंगा कि पूरा हुस्न तो तेरे ऊपर से ही टपक रहा है अफ्रीकी कृष्ण वर्णीय लोमड़ी।हे झपकी!तुम फूल न छूना, तुम्हारे घाव पड़ सकते हैं।दोष तुम मुझे दोगी कि उसके फूल होंगे।कोई बात नहीं।तुम अन्तिम बनकर मेरी प्राचेतस को लील गए हो।शरीर तुच्छ तरंगित भी नहीं हो पा रहा है।तुम जैसा सोचते हो यह जीवन वैसा नहीं हैं और कोई अलग भी चिन्तन न करना।ईश्वर सबसे बड़ा प्रेरक है।वही हमें शक्त्याबद्ध आधार के स्नेह का पान कराएगा।तुम अपने स्तर पर ठीक थे और मैं भी।कुछ कथन बन पड़े मेरे लिये तो कह डालना।हे ज्ञानसिन्धु!यह विराम अन्तिम नहीं है अभी।आगे भी होंगे।समय के मामले में बहुत दीन हूँ।जब धनाधिकता है तो समयाभाव है और जब धनाभाव है तो समयाधिकता है।दोनों में साम्य कब बनेगा यह ईश्वर इच्छा।सम्भवतः यह मेरी असफलता का कारण भी रहा।मेरा मनोबल पाताल में चला गया।शनै: शनै: पुनः अर्जित कर रहा हूँ।तुम लगे रहो ऐसे ही स्वानुसार।मेरी कलम बन्द नहीं है।समय मिलने पर लिखावट जारी रहेगी।धनाभाव खटकता है।आगे की यात्रा बहुत कठिन है।ईश्वर ने चाहा तो स्वीकार कर लेंगे।ईश्वर तुम्हें शान्ति दे।पुस्तक भेज देना।🙏🙏🙏

(सभी पोस्ट्स लगे हाथों यहाँ चिपका दी जाएगीं धीरे धीरे)

©अभिषेक: पाराशर:

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